नेपाली जी : स्मृति के झरोखों से - ************************** डॉ ० बलदेव
नेपाली जी : स्मृति के झरोखों से - ************************** डॉ ० बलदेव --------------- सांवले गठीले शरीर वाले नेपाली जी बंसत के अग्रदूत थे। उनकी ..... री मीठी कूक से हिन्दुस्तान की सब्ज वादियों से लेकर लाल मुरमी मैदान तक के इलाके गुंजायमान थे। विद्यापति की परम्परा में जन्मे नेपाली जी हिंदी के जातीय कवि थे। यौवन के उफान और जवानी के ज्वार से छलक छलक उठने वाले उनके गीत रस के गागर हैं। उमंग, उत्साह और शक्ति के अक्षय स्त्रोत वाले उनके गीत दरअसल नवसृजन की शब्द साधना है। अवसाद ,विषाद ,निराशा, अनास्था, कुंठा, संत्रास आदि की छाया जिनमें कहीं नहीं है। अल्हड़ ग्राम सौन्दर्य, यौवन की मस्ती, प्रणय और वेदना में सने उनके गीत प्रकृति के नानाविध रंगों-ध्वनियों के संस्पर्श से आज भी समूर्त हो उठते हैं। सौंदर्य , रहस्य, और राष्ट्रीय चेतना से सम्पन्न नेपाली दरअसल रससिद्ध कवि थे। उनमें लोक-संगीत की राग-रागनियाँ बोलती थी - इस समय उनकी कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं- बरसी तो रह गयी बरसती...