'कनुप्रिया ******* डाँ. बलदेव
'कनुप्रिया
*******
डाँ. बलदेव
(1973)
मांसल सौंदर्य के रोमानी कवि भारती ने अंधायुग और कनुप्रिया के द्वारा आधुनिक जीवन - बोध का रसात्मक चित्रण किया है । पुरानी भावुकता और रोमांसप्रियता के कारण भारती संभोग के चित्रकार कहे गये हैं।१ भारती , राधा में अपने मानस को प्रक्षिप्त करते हैं । बस यही उनका कसूर है । चंचल चौहान कनुप्रिया के संबंध में लिखते हैं , वह अंग्रेजी के विक्टोरियन , कवियों के जैसा प्रयास है जो प्रकृततः प्रगीतात्मक है।२ वे भारती पर छद्म भावाकुल तन्मयतामयी छायावादी कवियों की प्रश्नमयी मुद्रा की शिकायत करते हैं , बात गलत नहीं है , किन्तु क्या छायावादी संस्कार के कारण ही ' कनुप्रिया ' त्याज्य हो गयी ? अकेले चंचल चौहान की यह शिकायत नहीं है , बहुत से आलोचक हैं जो कवि को इसी कारण निषिद्ध मान बैठे हैं कि उन्होंने कनुप्रिया क्यों लिखी और लिखी तो अपेक्षित भाषा में क्यों नहीं लिखी ।
आधार
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कनुप्रिया ' श्री मद् भागवत ' के लीला स्वरूप और ' महाभारत ' के ' शलाका पुरुष ' कृष्ण और उनकी प्रिया का चरित गायन है । इस रचना का आधार उपर्युक्त दोनों ग्रंथ है । यहाँ लीला स्वरूप व्यक्तित्व के साथ कवि ने उनके महाभारत के राजनीतिज्ञ , कूटनीतिज्ञ व्यक्तित्व को रखकर देखने का प्रयत्न किया है।३ कनु के इन दोनों व्यक्तियों के बीच अत्यन्त कोमल तथा भावमय सेतु के रूप में राधा का व्यक्तित्व आता है । राधा का चरित्र परम्परागत होते हुए भी आधुनिक है । भागवत् जयदेव , चण्डीदास विद्यापति तथा सूर की भावविह्वल वही राधा यहां कनुप्रिया के रूप में उपस्थित हुई है । एक प्रकार से देखें तो यह नारी की काव्य यात्रा है , किन्तु वह रोमांटिक बोध के बजाय अस्तित्व बोध से सन्नद्ध है।४ इसे हमें वहाँ नहीं भूलना चाहिए ।
स्वरूप
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स्वरूप की दृष्टि से कनुप्रिया नई कविता के दौरान लिखा गया आख्यानक दीर्घ प्रगीत है । इसके अनेक शीर्षक बद्ध खंडों में गहरी एकान्विति है । कनुप्रिया में लीला भूमि के प्रसिद्ध स्थलों पर जहाँ इतिवृत्तात्मकता की गुंजाईश थी , वहाँ कवि ने सार्टकट अपनाकर अपनी विशिष्ट काव्य शैली का परिचय दिया है । उसने स्मृतिजन्य अनुभूतियों को लघु कथा चित्रों में अभिव्यक्त किया है , इसीलिए यह रचना परम्परागत खंड काव्यों से भिन्न प्रबन्धोन्मुखी आख्यानक प्रगीत काव्य है । इसमें प्रयुक्त गीत कतिपय ' टेक ' पद्धति पर आश्रित होता हुआ भी , और गीत के नाम से लिखे जाने पर भी गीत नहीं प्रगीत है । कारण उसमें आत्मानुभूति की ही प्रधानता है और शब्द योजना का मीठा संगीत उसके क्षीण कथा सूत्र चार खंडों के अन्तर्गत उन्नीस खंड प्रगीतों में ' पंत कृत ' अशोक वन जैसे ही विस्तरित है । कथाक्रम के कारण वे पूर्वा पर सम्बन्धों से आबद्ध ही नहीं बल्कि अखंडित है । ऊपरी तौर से पूर्वा पर सम्बन्धों के कारण यह प्रबन्ध कोटि की रचना मालूम होती है , किन्तु इसका अखंडित प्रवाह और आंतरिक संरचना इसे प्रगीतात्मक स्वर प्रदान करते हैं । नई कविता की कृति होने पर और आधुनिक भाव - बोध से अनुस्यूत होने पर भी कनुप्रिया छायावादी संस्कारों से मुक्त नहीं है । इसका जबर्दस्त कारण कवि की रागात्मक अनुभूति है जो कनुप्रिया की तन्मयता को आत्मसात कर विराट प्रकृति के सौंदर्य फलक पर प्रतिबिम्बित हो उठी है । इस गहरी तल्लीनता में अनजाने ही उठाये गये अस्तित्व और क्षणबोध के प्रश्न उसे आरोपित मूल्यों से अलग कर सहज ही नई कविता की भूमिका प्रदान करते हैं ।
आत्मपरकता , आख्यान की क्षीणता , प्रगीतात्मकता की अधिकता तथा नये मूल्यों के कारण कनुप्रिया नई कविता का एक विशिष्ट आख्यानक प्रगीत रचना है ।
आख्यान
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यौवनारंभ की अनुभूति के साथ ही कनुप्रिया के मन में कृष्ण के प्रति पूर्व राग जाग उठता है । समर्पण की भावना से जिस्म के तार - तार में सोया संगीत झंकृत उठता है । समर्पिता वह वीतराग कृष्ण की कल्पना से अपने पर खीज उठती है । कृष्ण दर्शन से संसार उसे कृष्णमय दिखाई देता है । यहाँ तक यमुना की सांवली गइराई भी जिसमें वह अपने आपको घंटों निहारती है । कार्पण्य दोषोपहत स्वभावः मुग्धा कनुप्रिया रास की रात को सोचती हुई कदम्ब की छांव तले शिथिल अस्त व्यस्त पड़ी रहती है।
मानगर्विता राधा कृष्ण के निराश लौट जाने पर आम्रडालियों के नीचे रोती रहती है । पांवों के घायल हो जाने पर भी वह कृष्ण की चन्दन बांहों में समा जाने के लिए उत्कंठित है । आम्रमंजरियों का संकेत न समझ पाने के कारण वह मंजरी - परिणय के चरम सुख की अनुभूति से वंचित रह जाती है । चरम साक्षात्कार के क्षणों में वह कृष्ण के अन्तरः सम्बन्धों को समझना चाहती है । कृष्ण उसे एक ही साथ सखा , बन्धु , आराध्य , शिशु , दिव्य सहचर आदि रूपों में , स्मृति के अनेक खंड चित्रों में दिखाई देते हैं । कृष्ण के विराट और शिशु रूप से , सखी , साधिका , बान्धवी , माँ , वधू , सहचरी कनुप्रिया अभिभूत हो उठती है । अन्तरसम्बन्धों के गहरे समुद्र में उसे लगता है सृष्टि संकल्प का प्रतिरुप वह स्वयं है । सृजन और विलय , जीवन की समस्त क्रियाएँ जैसे कृष्ण की इच्छा का परिणाम है और वह स्वयं इच्छा का पर्याय है । कभी वह प्रकृति और पुरुष के दिव्य सम्बन्धों से अपने को महिमा मण्डित पाती है तो कभी भय से छटपटाती जलपरी , और कभी अपने को रति पीड़ा से संज्ञा शून्य पाती है ।
चारों ओर अभिसार के इन्द्रजालिक संकेत उसे घेरने लगते हैं वहीं आदिम भय जो उसे कृष्ण से दूर ले गया था इस क्षण दूने आवेग से प्रिय के पास पहुंचा देता है । मिलनातुर प्रिया के अधखुले होंठ कंपने लगते हैं ... कंठ सूख जाता है पलकें मुंद जाती हैं और कृष्ण को अपने अंधे और सर्पिले कसाव में कस लेती है । फिर भी तृप्ति नहीं । समय का अचूक धनुर्धर अपनी उपेक्षा से क्रुद्ध एक ही झटके में प्रिया से कनु को दूर ले जाता है । कृष्ण के बिना आज कनुप्रिया कथा भरी अनुगूंज रह जाती है उसे लगता है उसका जिस्म कंपता हुआ सेतु है जिससे होकर इतिहास उसके प्रिय को लीला भूमि से दूर हो गया है और वह पीछे निरर्थक छूट गयी है ।
वर्षा से बचने के लिए उसके अंचल में छिपने वाला छौना आज कितना महान हो गया है , किन्तु उसके महान बनने में जैसे कनुप्रिया का सब कुछ बिखर गया है । युद्ध की ओर जाती हुई कृष्ण की अक्षोहिणी सेना अभिसार स्थली को रौंदती चली जा रही है । विडम्बना है , इतिहास क्रूर हो उठा है । वह इस पर गर्व कैसे करे । युद्ध के भयानक संकेतों और अमानुषिक समाक्षरों से कनुप्रिया भयभीत है । एक रात उसने स्वप्न देख-
समुद्र जैसे युद्ध स्थल हैं ... कृष्ण युद्ध की विभीषिका से खिन्न , उदासीन , विस्मृत और आहत हो गए हैं उनकी अक्षय तरुणाई पर थकान छा गई है । समय को ललकारने वाला , अठारह अक्षौहिणी सेना का नायक आज इतना निरीह हो गया है कि हांक लगाने पर भी कोई उसकी नहीं सुनता अन्त में वे हारकर कनुप्रिया को पुकार उठते हैं । उसके वृक्ष के गहराव में चौड़ा माथा रखकर सो गए हैं नींद में स्वधर्म , स्वकर्म , दायित्व आदि शब्दों को बुदबुदाते हुए अचानक जाग उठते हैं ... इन मूल्यों की कसौटी के अभाव में वे इतिहास को जीर्ण वसन - सा त्याग देते हैं ... । व्यक्ति इन्हें अपनी सुविधानुसार ओढ़ता हैं । उन्हें शक्तिशाली इतिहास के सामने अभिमन्त्रित गाण्डीव सिवार जैसे हलका दिखाई देने लगता है । वे छिन्न नारियल कुंज में कनुप्रिया के लिए तड़प उठते हैं । इसी के समापन के साथ कनुप्रिया अपनी सार्थकता पा जाती है । वह कृष्ण की नियति बन जाती है , क्योंकि उसके बिना कृष्ण इतिहास के अर्थ कैसे दे पायेंगे ... उसके बिना इतिहास अधूरा और निरर्थक है परन्तु वे अब की बार वह कृष्ण के नशीले संगीत की मात्र ' लय ' बनकर नहीं , बल्कि नये इतिहास के निर्माण में साथ देने के लिए उनकी एक पुकार में चली आती है । पगडंडी के कठिन से कठिन मोड़ पर वह कृष्ण की प्रतीक्षा में अडिग खड़ी रहती है ।
प्रतीकात्मक चरित्र
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' कनुप्रिया ' में वही एक मात्र चरित्र है । वैसे उसके दीर्घ एकालाप में कृष्ण का परम्परागत चरित्र भी उजागर हुआ है । कृष्ण में एक ओर तो विकट कर्मों को करने की शक्ति है और दूसरी ओर है बाल सुलभ ऋजुता । वे कनुप्रिया के सखा , बन्धु , आराध्य , शिशु , दिव्य सहचर सब कुछ हैं , परन्तु इतिहास उन्हें अन्दर से रिक्त कर देता है और वे कनुप्रिया के लिए तड़फ उठते हैं । जिस वैयक्तिक जीवन से वे सामाजिक दायित्व की ओर बढ़े थे , वहीं वे लौट आना चाहते हैं । यदि उनमें प्रणय और युद्ध को झेल पाने की क्षमता है , तो मानवीय दुर्बलताएँ भी हैं । इतना ही नहीं वहाँ कृष्ण मानवीय संवेदनाओं की प्रतिमूर्ति होने के कारण सार्वलौकिक भी है । गोकुल का ग्वाल बालक और महाभारत का परम कूटनीतिज्ञ जिस कृष्ण में वे दोनों रूप समन्वित होते हैं , वह केवल राधा का वैष्णव सम्प्रदाय का उपास्य नहीं , बल्कि समस्त भारतीय प्रतिभा का शलाका पुरुष है।५ यदि सूक्ष्म रूप से देखा जाए तो कवि ने इस रचना में कृष्ण के चरित्र का आश्चर्यजनक रूप से हास कर दिया है । भावोच्छवास में वह भूल जाता है जिस कृष्ण को उसने अंधायुग में ' ज्योति - कथा , भविष्य का रक्षक और अनासक्त योगी कहकर इतिहास क्या , नक्षत्रों तक की गति बदलने वाला कहा है , उसी को निरीह बना देना क्या उसकी बुद्धिमानी कही जावेगी ?
यहाँ कनुप्रिया श्री मद् भागवत की ' प्रिय गोपिका ' जयदेव , विद्यापति , चण्डीदास तथा सूर की राधा होती हुई भी पूर्णतया आधुनिका है । भारती के सम्पूर्ण काव्य में जो रोमांस और मांसलता है , वही इस कृति में कनुप्रिया के रूप में सशरीर अभिव्यक्त है । समर्पण के क्षणों में यदि वह भक्ति भावना की प्रतिमूर्ति बन जाती है तो केलि क्षणों में आधुनिक विलासिनी को भी मात कर जाती है । समय के अचूक धनुर्धर की उपेक्षा कर वह केलि रत रहना चाहती है-
उठो मेरे प्राण
और काँपते हाथों से यह वातायन बन्द कर दो
और कह दो समय के अचूक धनुर्धर से
कि अपने शायक उतार कर
तरकस में रख ले
और तोड़ दे अपना धनुष
और अपने पंख सपेटकर द्वार पर चुपचाप
प्रतीक्षा करें , जब तक मैं
अपनी प्रगाढ़ केलि कथा का अस्थायी विराम -
चिन्ह अपने अधरों से
तुम्हारे वक्ष पर लिखकर , थककर
शैथिल्य की बांहों में , डूब न जाऊँ ।
परन्तु विरह के क्षणों में यथार्थ का ज्ञान उसे हो जाता है । मोह भंग के बाद वह सजग हो जाती है । अपने अस्तित्व के लिए वह व्यक्ति और इतिहास के बीच मात्र सेतु नहीं बनना चाहती वरन् उसमें अपना महत्वपूर्ण हिस्सा चाहती है । यहीं वह पूर्णतया आज की जागरूक नारी है जो अपने अधिकारों के लिए सचेत है यहाँ वह परम्परागत राधा की विरह के क्षणों में तिलतिल आसुओं से समय शिला नहीं काटती , प्रत्युत पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने की आकांक्षा रखती है क्योंकि उसके बगैर इतिहास का कोई अर्थ नहीं कृष्ण के वैयक्तिक आकांक्षाओं में लौटने पर वह इसे प्रमाणित भी कर देती है ।
वस्तुतः राधा और कृष्ण , प्रकृति और पुरुष के रूप में यहाँ चित्रित शाश्वत पात्र होते हुए भी आधुनिक स्त्री - पुरुष के प्रतीकात्मक चरित्र है । यदि कवि ‘ सृष्टि संगिनी ' प्रगीत खंड में नारी पुरुष के शाश्वत सम्बन्ध को अभिव्यक्त करता है , तो ' इतिहास - खंड ' में अस्तित्व से जुड़े प्रश्न , आधुनिक जीवन प्रक्रिया को भी स्पष्ट करता है । कनुप्रिया आज की आधुनिक नारी का प्रतीक है , जो सम्पूर्ण समर्पण के बाद भी अपने अस्तित्व के प्रति सजग है । पुरुष का प्रेरणास्रोत होते हुए भी वह इतिहास के निर्माण में अपना हिस्सा चाहती है । स्पष्ट है कि यहाँ कनुप्रिया मात्र विलास की सामग्री नहीं , प्रत्युत सखी , सहचरी , माँ वधू के रूप में प्रतिष्ठित है इसीलिए वह त्याज्य नहीं है और न ही उसकी आकांक्षा गलत या निंदनीय है -
तुमने मुझे पुकारा था न , मैं आ गयी हूँ कनु
और जन्मान्तरों की अनंत पगडण्डी के
कठिनतम मोड़ पर खड़ी होकर तुम्हारी प्रतीक्षा
कर रही हूँ
कि , इस बार इतिहास बनाते समय
तुम अकेले न छूट जाओ ।
शैली
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कनुप्रिया एकालाप शैली में लिखी गई नाटकीय कविता है । लम्बी होती हुई ' भी नाटकीयता के कारण इसमें अत्यधिक कसावट आ गई है । ' अमंगल छाया ' में नाटकीयता का चरम उत्कर्ष है । बातचीत की सहज लय की जो पहचान कविता में होनी चाहिए , कनुप्रिया में वह जोरदार है । भावावेश के क्षणों की अभिव्यक्ति का एक - दो उदाहरण देखिए-
1. और तुम्हारी सम्पूर्ण इच्छा का अर्थ हूँ
केवल मैं , केवल मैं , केवल मैं
2. और इस तमाम सृष्टि में मेरे अतिरिक्त
यदि कोई है तो केवल तुम,केवल तुम,केवल तुम
तो मैं डरती किससे हूँ मेरे प्रिय ?
केवल तुम या मैं की तीन - तीन आवृत्तियों से यहाँ कृष्ण के प्रति गहरी आसक्ति व्यंजित हो गई है । अंतिम पंक्ति में भावावेश के बाद जैसे वह संयत हो उठी है , जैसे कोई सचमुच काव्य से खड़े होकर हमसे कुछ कह रहा है -
1. तुम्हारा अजीब - सा प्यार है
जो सम्पूर्णतया बांधकर भी
सम्पूर्णतः मुक्त छोड़ देता है
छोड़ क्यों देता है प्रिय ?
2. तुमने मुझे पुकारा था न
मैं आ गयी हूँ कनु ।
यहाँ कहाँ लगता है ' हम कविता पढ़ रहे हैं । रागात्मक अनुभूतियाँ की एक रसता के कारण यह दीर्घ प्रगीत शिथिल एवं नीरस हो जाता , परन्तु कवि ने बड़े धैर्य और सूझबूझ से काम लिया है ... वह है रीति का आग्रह । भारती प्रारंभ से ही कलात्मक अभिरुचि के कवि रहे हैं । उन्हीं के शब्दों में एक सफल कलाकार को कला की वाह्यअभिव्यक्ति को उतनी ही सूक्ष्मता से ग्रहण करना पड़ता है । जितनी सूक्ष्मता से वह अपनी अनुभूति को ग्रहण करता है । इसी संवेदना और अभिव्यंजना क्षमता के कारण भारती ने शारीरिक और मानसिक प्रक्रियाओं के सौंदर्य चित्रण में समकालीन अनेक समर्थ कवियों से बाजी मार ली है । कवि प्रसिद्धि और प्रतीकों का समावेश कर कवि ने काव्य भाषा के माध्यम से अत्यंत सूक्ष्म जीवन प्रक्रियाओं को " अभिव्यंजित किया है । पहला और दूसरा गीत ही लीजिए इनमें यौवनारंभ और उसके विकास की अवस्था का चित्रांकन किस खूबी से किया गया है । प्रथम गीत में जावक रचित पावों के आघात से अशोकवृक्ष के पुष्पित होने की बात कही गयी है । इस कवि समय से यौवनारंभ का निम्न चित्र साफ उभरकर चाक्षुष हो जाता है-
फिर भी तुम्हें याद नहीं आया, नहीं आया
तब तुमको मेरे इन जावक-रचित पाँवों ने
केवल यह स्मरण करा दिया कि मैं तुम्ही में हूँ
तुम्हारे ही रेशे-रेशे में सोयी हुई
और अब समय आ गया है कि
मैं तुम्हारे डाल - डाल में गुच्छ-गुच्छ लाल-लाल
कलियाँ बन खिलूंगी
यौवन के पूर्ण विकास का चित्र दूसरे गीत में इस प्रकार है -
पर हाय मुझे क्या मालूम था
कि इस बेला जब अपने को
अपने से छिपाने के लिए मेरे पास
कोई वरण नहीं रहा
तुम मेरे जिस्म के एक तार से झंकार उठोगे
सुनो ! सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
इस क्षण की प्रतीक्षा में तुम
कब से मुझ में छिप सो रहे थे ।
उपर्युक्त पंक्तियों में एक ओर यौन विकास अर्थात् शारीरिक प्रक्रिया स्पष्ट है दूसरी ओर कृष्ण के प्रति किशोरवय जनित सुप्त अनुराग का स्वर्ण संगीत के रूप में झंकृत होने , यानी मानसिक उथल - पुथल को शब्दबद्ध किया गया है । इस प्रकार के संयोग और वियोग के अनेक सुन्दर बिम्ब यहाँ अंकित है । यहाँ रस की अपेक्षा प्रभाव पर बल दिया गया है । शृंगार के दोनों पक्षों के सफल चित्रण के बाद भी कवि का लक्ष्य यहाँ रस की सृष्टि करना नहीं बल्कि तीक्ष्ण अनुभूति से साक्षात्कार कराना है । भारती के शब्दों में कविता का मुख्य कार्य आज के रूढ़ अर्थों में रसोद्रेक मात्र न रहकर प्रभाव डालना ही हो गया है।६ यह बात कनुप्रिया के संबंध में भी खरी उतरती है ।
भारती का दूसरा कौशल है , चरम साक्षात्कार के क्षणों को मिथकीय जादू में परिवर्तित करना , यह प्रयोग अत्यधिक प्रभावशाली है-
1. हाँ चन्दन
तुम्हारे शिथिल आलिंगन में
मैंने कितनी बार इन सबको रीतता हुआ पाया है ।
मुझे ऐसा लगा है
जैसे किसी ने सहसा इस जिस्म के बोध से
मुझे मुक्त कर दिया है
और इस समय मैं शरीर नहीं हूँ
मैं मात्र एक सुगन्ध हूँ।
2. आज अंधेरे में भी दृष्टियाँ जाग उठी है
और हवा का आघात भी मांसल हो उठा है
और मैं अपने से ही भयभीत हूँ
3. दिशाएँ घुल गयी है
जगत लीन हो चुका है
उपर्युक्त उद्धरणों को दूसरे शब्दों में तद्वत् पद्य - बद्ध कर पाना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है परन्तु कहीं कवि ने यौन- अतृप्ति का घनघोर मांसल शृंगार प्रस्तुत कर रीतिकालीन कवियों को भी पछाड़ दिया है लगता है यहाँ कवि की जगह फ्रायड और कनुप्रिया की जगह कैबरा डान्सर बोल रही है । यही कला भारती को नये कवियों के बीच हीरो के रूप में प्रस्तुत करती है । परन्तु कला का यह एक पक्ष है , वियोग शृंगार के चित्रों में भी कवि को इतना ही कमाल हासिल है , तब आलोचकों की आचार्यत्व वाली मुद्रा रोष मुक्त हो जाती है -
वह सब अब भी ज्यों का त्यों है
दिन ढले आम के बौरों का
चारों ओर अपना माया जाल फेंकना
जाल में उलझकर मेरा बेबस चले जाना
नया है केवल मेरी सूनी माँग आना
शिथिल चरण असमर्पिता , ज्यों का त्यों लौट
जाना
बसन्त का इन्द्रजालिक उद्दीपन और उसी मात्रा में विरह का सुलगना यहाँ ज्यों का त्यों उतार दिया गया है । ऐसे स्थल अनेक हैं जहाँ मधुर वेदनाओं की सृष्टि करने में भारती की कला सफल हुई है । नई कविता की इसी भूमि पर कवि पुराने लिबास को एक झटके से उतार फेंकता है और महाभारतीय परिवेश में एक से एक सशक्त बिम्बाकन प्रस्तुत कर अपनी अभिव्यंजना को सार्थक बनाता है । यहाँ बिम्ब और प्रतीकों का एक संशिष्ट चित्र देखिए -
लहरों के नीचे अवगुण्ठन में
जहाँ सिन्दूरी गुलाब जैसा सूरज खिलता था
वहाँ सैकड़ों निष्पल सीपियाँ छटपटा रही हैं
और तुम मौन हो
मैंने देखा कि अगणित विक्षुब्ध विक्रान्त लहरें
फेन का शिरस्त्राण पहने
सिवार का कवच धारण किए
निर्जीव मछलियाँ के धुनष लिए
युद्ध मुद्रा में आतुर हैं
यहाँ गुलाब का सूरज से मूर्त का मूर्त सादृश्य विधान किया गया है इसके अतिरिक्त शक्तिशाली व्यक्ति अर्थात् कृष्ण का प्रतीकात्मक शब्द है । इसी प्रकार निष्फल सीपियाँ घायल सैनिकों का , फेन- मुकुट का , शिरस्त्राण दायित्व का , कवच आत्मरक्षा का निरीह मछलियाँ- इच्छाओं का प्रतीकार्थक शब्द हैं , इसके उपरान्त पूरा का पूरा चित्र युद्ध क्षेत्र का ही नहीं बल्कि कनुप्रिया और कृष्ण के मानसिक संघर्षों का संश्लिष्ट बिम्बाकंन है । वैसे तो इस कृति में अनेक प्रतीकार्थक शब्द प्रयुक्त है , जिनका स्थायी महत्व है , जैसे अशोक वृक्ष , स्वर्णिम संगीत , सांवली गहराई , सांवले समुद्र आदि कृष्ण के लिए , आम्रबौर , सिन्दूर के , पगडंडी मांग के पहला बौर अछू प्यार के विराट- समुद्र भयानक युद्ध के प्रतीक हैं । यहाँ भारतीय ने बिम्ब निर्माण में अलंकारों का भी प्रश्रय लिया है । अनुभूति स्वभावतः उपमा और रूपक के सांचे में ढलकर रूपायित होती है।७ परम्परागत अलंकारों में उपमा और रूपक के अतिरिक्त असंगति , अपन्हुति , उत्प्रेक्षा और अनुप्रासों का सुन्दर प्रयोग हुआ है । यहाँ एक - दो उदाहरण दृष्टव्य है -
उपमा 1. मेरा यह वेतस लता - सा कांपता तन बिम्ब
2 .बुझी हुई राख - सा , टूटे हुए गीत , रीते हुए
पात्र
बीते हुए क्षण - सा मेरा यह जिस्म
3.मन्त्र पढ़े बाण से छूट गये तुम तो कनु
शेष रही हैं , काँपती प्रत्यंचा रूपक सी
तुम्हारे नील जलज - तन की परिक्रमा
देखकर नाच रही
कनुप्रिया में अपन्हुति का विशेष रूप से प्रयोग हुआ है-
मानो यह यमुना की सांवली गहराई नहीं है । यह तुम हो । यहाँ यमुना की सांवली गहराई का निषेध कर कृष्ण के तन का आरोपण हुआ है । इसी प्रकार-
इस समय मैं । शरीर नहीं हूँ । मैं मात्र एक सुगन्ध हूँ ।
आदि अपन्हुति के श्रेष्ठ उदाहरण हैं । उपर्युक्त समस्त उदाहरणों में कनुप्रिया की भाषा के मिठास का अन्दाजा लगाया जा सकता है । कनुप्रिया में एक ओर तो संस्कृत के तत्सम , अर्ध तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है दूसरी ओर उर्दू शब्दों की ' भरमार है । इससे कनुप्रिया की भाषा काफी गझीन हो गयी है , लेकिन अनुभूति की तीव्रता के कारण पाठक को अविभूत किये बिना नहीं रहती । अज्ञेय के अनुसार यही छायावादी काव्य संस्कार की भाषा कनुप्रिया की कमजोरी है।८ डॉ . रघुवंश के अनुसार उसके लिए उपयुक्त भाषा है । उसके माध्यम से कवि ने उस उदात्त तथा भावानुकूल कथा को संवेदना के स्तर पर व्यंजित किया है । काव्य जिस संवेदन के स्तर पर अवतरित होता है भाषा उसी पर प्रस्तुत हो जाती है । क्योंकि भाषा जीवन की प्रक्रिया का अंग है।९ नामवर सिंह की यह शिकायत कि कनुप्रिया में जहाँ छायावादी ढंग की काव्य भाषा का उपयोग किया गया है । उससे कविता के भाव बोध की कच्चाई , बौद्धिक अपरिपक्वता एवं कैशोर भावुकता का पता चलता है , उचित नहीं लगता।१० वस्तुतः कनुप्रिया आम्रबौर की लिपि में लिखी गई भाषा है जिसकी तुर्शी बड़ी मोहक है और जिसमें अनुभूति की गहराई है ।
कनुप्रिया मात्र गद्य गीतात्मक कृति नहीं है बल्कि मुक्त छंद में लिखी गई प्रगीतात्मक रचना है । इसमें शास्त्रीय छंदों के निर्वाह बिना भी पहाड़ी झरने सा आद्यन्त लय का अप्रहित आवेग है । स्वयं भारती लय के आग्रही रहे हैं । “ आजकल की कविता की अन्विति बोलचाल की अन्विति मांगती है । पर गद्य की लय नहीं मांगती तुक - ताल का बंधन उसने अनात्यन्तिक मान लिया है , पर लय को वह उक्ति का अभिन्न अंग मानती है । "११ " नाटकीय उक्ति वैचित्र्य के कारण इसमें गेयता नहीं है । वैसे भी गेयता प्रगीत का अनिवार्य अंग नहीं है । प्रगीत के अन्य तत्व ध्वन्यात्मकता रागात्मकता , चित्रात्मकता आदि इस काव्य में सर्वत्र व्याप्त है । एक चित्र यहाँ पर्याप्त होगा-
बुझी हुई राख , टूटे हुए गीत , डूबे हुए चाँद
रीते हुए पात्र बीते हुए क्षण - सा मेरा यह जिस्म
कल तक जो जादू था , सूरज था , वेग था
तुम्हारे आश्लेष में
आज वह जूड़े से गिरे हुए बेले सा
टूटा है , ग्लान है
दुगुना सुनसान है
बीते हुए उत्सव - सा , उठे हुए मेले - सा
मेरा यह जिस्म
टूटे खण्डहरों के उजाड़ अन्तःपुर। में
छूटा हुआ साबित मणि जड़ित दर्पण - सा
आधी रात दंश भरा बाहुहीन
प्यासा सर्पील कसाव एक
' जिसे जकड़ लेता है ।
अपनी गुंजलके में
अब सिर्फ मैं हूँ , यह तन है , और याद है
खाली दर्पण में धुंधला - सा एक प्रतिबिम्ब
मुड़मुड़ लहराता हुआ
निज को दोहराता हुआ
भावाभिव्यंजना
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अविराम जीवन प्रक्रिया के लिए प्रकृति और पुरुष का संबंध शाश्वत है । यही संबंध सृष्टि सृजन का रहस्य है । सृष्टि पुरुष की इच्छा का ही परिणाम है और इच्छा स्वयं प्रकृति है । -
तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व का अर्थ है
मात्र तुम्हारी सृष्टि
तुम्हारी सम्पूर्ण सृष्टि का अर्थ है
मात्र तुम्हारी इच्छा
और तुम्हारी सम्पूर्ण इच्छा का अर्थ हूँ
केवल मैं
केवल मैं
केवल मैं
अर्थात् स्त्री , प्रकृति ही पुरुष जाति की शक्ति सम्बल और योगमाया है । वह इस अनादि यात्रा में पुरुष का सहयात्री है परन्तु आज इतिहास ने दोनों को अलगा दिया है आज की स्त्री पुरुष जैसा ही स्वतंत्र अस्तित्व रखती है । और वह भी क्षण से जुड़ी हुई है । आज वह पुरुष की मात्र इच्छा नहीं मात्र केलि संगिनी नहीं , प्रत्युत सृष्टि संगिनी है ... वह पुरुष के नशीले संगीत की मात्र लय बनना नहीं चाहती , बल्कि इतिहास के निर्माण में ... उन्मुक्त वातावरण में सम्मिलित होकर अस्तित्व प्रमाणित करना चाहती है । क्योंकि उसके बिना पुरुष अधूरा है , साथ वह स्वयं भी ।
व्यक्तित्व के निर्माण में क्षण विशेष का अत्यधिक महत्व है । जीवन के प्रत्येक दिए गए क्षण की स्वीकृति इतिहास की सार्थकता है व्यक्ति को अलग कर उसके दायित्व का सारा बोध झूठा पड़ जाता है।१२ क्षण के माध्यम से सही व्यक्ति इतिहास की ओर बढ़ सकता है । उसमें महान शक्ति होती है । वह विज्ञान के सबसे बड़े रूप के लिए इलेक्ट्रान , प्रोटान , न्यूट्रान जैसा छोटा रूप है।१३ उसकी तन्मयता में सम्पूर्ण सृष्टि सिमट जाती है । यही वह एक क्षण है जो इतिहास से कटे हुए व्यक्ति को सार्थक जीने के लिए सान्त्वना प्रदान करता है । अस्तु यहाँ क्षण को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए । व्यक्ति के विकास के लिए तन्मयता के क्षण भी वैसे पर्याप्त नहीं , उसे भी उस क्षण विशेष से गुजरकर आगे कर्मक्षेत्र की ओर आगे बढ़ना होगा . ... परन्तु व्यक्ति भावना को , सहृदयता को , सम्पूर्ण रूप से त्याग कर बुद्धि और तर्क के सहारे भी ज्यादा दूर नहीं चल सकता । इतिहास क्रूर होता है और वह न तो व्यक्ति की कोमल भावनाओं को रौंदने से चूकता है और न ही अपनी असलियत में सत्कार्य , स्वधर्म , न्याय जैसे मूल्यों के लिए कोई आकर्षण शेष रखता । ये मूल्य भारती जी के अनुसार व्यक्ति अपनी सुविधानुसार अपने सम्मान के लिए ओढ़ता है अतः इनके सदाशयता का प्रश्न निरर्थक है । कवि ने समुद्र स्वप्न के बहाने इस प्रश्न को खास तौर से उठाया है -
जो मेरे पैताने है वह स्वधर्म
जो मेरे सिरहाने है वह अधर्म
और यदि कहीं उस दिन मेरे पैताने
दुर्योधन होता तो ?
यह महत्वाकांक्षा का छद्मदायित्व बोध व्यक्ति को अंदर से कमजोर बनाता है । कनुप्रिया में युद्ध की महानता से अभिमंत्रित गांडीव अपनी गरिमा खो देता है । में अठारह अक्षोहिणी सेना का नायक , कृष्ण जैसा पुरुषार्थ निरीह हो जाता है । यहाँ से फिर वह रागात्मक संबंधों की तलाश करता है । क्योंकि जीवन के मूल विपर्यय का हल निरी बुद्धि से ऐतिहासिक चिन्तन और विशेषण से नहीं निकल सकता । मानवता की समस्याएँ मानव की जिस अखंड एकता के स्तर पर पहल की जाती है वहाँ विज्ञान एवं तर्क विज्ञान एवं तर्क का स्तर नहीं बल्कि रागात्मक संबंधों का स्तर है।१४ " संक्षेप में कनुप्रिया के माध्यम से प्रकृति के शाश्वत संबंधों की पृष्ठभूमि मानवीय युगबोध , नारी जागरण , अस्तित्व और क्षण की महत्ता जैसे नई कविता के विषय को स्थापित करने का प्रयास भावनात्मक स्तर पर कवि ने किया है और उसमें काफी हद तक सफल रहा है ।
संदर्भ :-
1. लक्ष्मण दास गौतम- धर्मवीर भारती , पृ . 181 , वही पृ . 205
2. देवीशंकर अवस्थी- विवेक के रंग , पृ . 108 ( अज्ञेय का लेख ) ||| = 26
3. डॉ . रघुवंश - साहित्य का नया परिप्रेक्ष्य , पृ . 24 4. यश गुलाटी- श्रेष्ठ काव्यों का मूल्यांकन , पृ . 717 ( रमेश कुन्तल का लेख )
5. देवीशंकर अवस्थी- विवेक के रंग , पृ . 109 ( अज्ञेय का लेख )
6. अज्ञेय - दूसरा सप्तक , पृ . 178 ( भारती का वक्तव्य )
7. लक्ष्मण दास गौतम- धर्मवीर भारती , पृ . 205 ( चंचल चौहान का लेख )
8. कल्पना जनवरी , 1960 , पृ . 61
9. डॉ . रघुवंश- साहित्य का नया परिप्रेक्ष्य , पृ . 236 10. नामवरसिंह - कविता के नये प्रतिमान , पृ . 118 11. नयी कविता- अंक 2 पृ . 38
12. डॉ . रघुवंश- हिन्दी साहित्य का परिप्रेक्ष्य , पृ . 235
13. डॉ . कमलकान्त पाठक- छायावादोत्तर हिन्दी काव्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि , पृ . 348
14. कल्पना जनवरी , 1960 , पृ . 60 ( अज्ञेय का लेख )
प्रस्तुति:- बसन्त राघव, पंचवटी नगर, बोईरदादर
रायगढ़, छ.ग.।मो.नं.8319939396
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