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Showing posts from January, 2022

नेपाली जी : स्मृति के झरोखों से - ************************** डॉ ० बलदेव

  नेपाली जी : स्मृति के झरोखों से - ************************** डॉ ० बलदेव ---------------    सांवले गठीले शरीर वाले नेपाली जी बंसत के अग्रदूत थे। उनकी ..... री मीठी कूक से  हिन्दुस्तान की सब्ज वादियों से लेकर लाल मुरमी मैदान तक के इलाके गुंजायमान थे। विद्यापति की परम्परा में जन्मे नेपाली जी हिंदी के जातीय कवि थे। यौवन के उफान और जवानी के ज्वार से छलक छलक उठने वाले उनके गीत रस के गागर हैं। उमंग, उत्साह और शक्ति के अक्षय स्त्रोत वाले उनके गीत दरअसल नवसृजन की शब्द साधना है। अवसाद ,विषाद ,निराशा, अनास्था, कुंठा, संत्रास आदि की छाया जिनमें कहीं नहीं है। अल्हड़ ग्राम सौन्दर्य, यौवन की मस्ती, प्रणय और वेदना में सने उनके गीत प्रकृति के नानाविध रंगों-ध्वनियों के संस्पर्श से आज भी समूर्त हो उठते हैं। सौंदर्य ,  रहस्य, और राष्ट्रीय चेतना से सम्पन्न नेपाली दरअसल रससिद्ध कवि थे। उनमें लोक-संगीत की राग-रागनियाँ बोलती थी - इस समय उनकी कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं-                 बरसी तो रह गयी बरसती...

'कनुप्रिया ******* डाँ. बलदेव

  'कनुप्रिया ******* डाँ. बलदेव (1973) मांसल सौंदर्य के रोमानी कवि भारती ने अंधायुग और कनुप्रिया के द्वारा आधुनिक जीवन - बोध का रसात्मक चित्रण किया है । पुरानी भावुकता और रोमांसप्रियता के कारण भारती संभोग के चित्रकार कहे गये हैं।१ भारती , राधा में अपने मानस को प्रक्षिप्त करते हैं । बस यही उनका कसूर है । चंचल चौहान कनुप्रिया के संबंध में लिखते हैं , वह अंग्रेजी के विक्टोरियन , कवियों के जैसा प्रयास है जो प्रकृततः प्रगीतात्मक है।२ वे भारती पर छद्म भावाकुल तन्मयतामयी छायावादी कवियों की प्रश्नमयी मुद्रा की शिकायत करते हैं , बात गलत नहीं है , किन्तु क्या छायावादी संस्कार के कारण ही ' कनुप्रिया ' त्याज्य हो गयी ? अकेले चंचल चौहान की यह शिकायत नहीं है , बहुत से आलोचक हैं जो कवि को इसी कारण निषिद्ध मान बैठे हैं कि उन्होंने कनुप्रिया क्यों लिखी और लिखी तो अपेक्षित भाषा में क्यों नहीं लिखी । आधार ---------                          कनुप्रिया ' श्री मद् भागवत ' के लील...

साहित्य वाचस्पति पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी पर विशेष आलेख:- डाँ. बलदेव काव्य यात्रा

  साहित्य वाचस्पति पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी पर विशेष आलेख:- डाँ. बलदेव काव्य यात्रा ********* खड़ी बोली के विकास में जिन साहित्य मनीषियों ने अपना सर्वस्व अर्पित किया था , उनके बीच साहित्य वाचस्पति पं . लोचनप्रसाद पांडेय का नाम अत्यंत श्रद्धापूर्वक लिया जाता है । आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने म.प्र . की काव्य प्रवृत्तियां शीर्षक लेख में उनकी महत्ता इन शब्दों में व्यक्त की है- श्री लोचन प्रसाद पाण्डेय और उनके अनुज श्री मुकुटधर पाण्डेय हिन्दी काव्य में उसी प्रकार समादृत हैं , जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में मैथिलीशरण गुप्त और उनके छोटे भाई सियारामशरण गुप्त ' । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल की नई धारा के प्रथम उत्थान में भारतेन्दु , प्रतापनारायण मिश्र , प्रेमधन , ठा . जगमोहन सिंह और अम्बिका प्रसाद व्यास को प्रमुख कवियों के रूप में स्वीकार किया है । नई धारा के द्वितीय उत्थान के कवियों में उन्होंने श्रीधर पाठक , हरिऔध पं . महावीरप्रसाद द्विवेदी , मैथिलीशरण गुप्त , पं . रामचरित उपाध्याय , गिरधर शर्मा नवरत्न और लोचनप्रसाद पाण्डेय की गणना की है । द्वि...

आशीष की वर्षा करता एक ऋषि (पद्मश्री पं.मुकुटधर पांडेय ***************************************** बसन्त राघव

  आशीष की वर्षा करता एक ऋषि (पद्मश्री पं.मुकुटधर पांडेय ***************************************** बसन्त राघव     पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी स्वयं में साहित्य - तीर्थ थे , उनके दर्शनों का लाभ मुझे 10-12 वर्ष की उम्र से होता रहा । पंडित जी काव्य पाठ के लिए कभी बाहर नहीं निकलते थे । हम उनके पड़ोसी थे । अस्तु जब भी गोष्ठियाँ होती । हमारे यहाँ आकर कवियों का बराबर उत्साहवर्धन किया करते थे । इन गोष्ठियों में पुरानी पीड़ी के लोगों में पंडित जी के अतिरिक्त वयोवृद्ध साहित्यकार पं.किशोरी मोहन त्रिपाठी , सेनानी कवि स्व.बन्दे अली फातमी , लाला फूलचन्द , चन्द्रशेखर शर्मा , जनकवि आनंदी सहाय शुक्ल , मुस्तफा हुसैन जैसे सशक्त गीत हस्ताक्षर हुआ करते थे । डॉ . महेन्द्र सिंह परमार , आलोचक प्रवर अशोक कुमार झा और ठाकुर जीवन सिंह भी उपस्थित रहते थे । नये कवियों में स्व.रामेश्वर ठेठवार , रामलाल निषाद , शम्भु प्रसाद साहू आदि दर्जनों कवि हुआ करते थे । इनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ अंचल , और उसके बाहर , देश के दूर - दूर से प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ . बलदेव के आमन्त्रण पर रायगढ़ आते तो पंडित जी के दर्शन अ...

कवि और उसका चरित्र, मुकुटधर पांडेय

 कवि और उसका चरित्र  ****************** पं.मुकुटधर पांडेय       कवि शब्द बहुत महत्व का है । कवि का आसन बहुत ऊंचा है । राज राजेश्वरों की भी पहुंच वहाँ तक नहीं । इसका कारण यह है कि कवि ईश्वरीय विभूति संपन्न होते हैं । इसीलिए लोग उन्हें पूज्य दृष्टि से देखते हैं । और उनकी रचनाएँ संसार की स्थाई संपत्ति समझी जाती हैं । इन रचनाओं में सर्वत्र प्रतिभा की प्रभावशालिनी रश्मियों का समावेश रहता है । इस कारण वे मनुष्य की हृदय कलिका को खिलाकर उसके अंतर प्रदेश को प्रकाशित करने की शक्ति रखती है ।        अच्छा , तो कवियों के व्यक्तिगत चरित्र कैसे होते हैं ? क्या वे सदैव ही अनुकरण योग्य होते हैं ? क्या साधारण लोग उनका अनुकरण करके लाभ ही उठा सकते हैं ? आजकल शिक्षित लोगों में विशेषकर उन नवयुवकों में जिन्हें कविता से प्रेम है और जो कुछ तुकबंदी करने का यत्न किया करते हैं , कवियों के चरित के अनुकरण की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है । कवियों का महत्व देखते यदि लोगों में उनकी नकल करने का उत्साह उत्पन्न हो तो कोई आश्चर्य नहीं । यदि वे नीर क्षीर विवेक का अनुसरण करते तो शि...

छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध:-मुकुटधर पांडेय ************************************* निवेदन ---------

  छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध:-मुकुटधर पांडेय ************************************* निवेदन ---------            पण्डित मुकुटधर पांडेय हिन्दी के उन शीर्षस्थ यशस्वी साहित्यकारों में से एक हैं जिन्हें उनकी एक दो रचनाओं से ही यथेष्ट ख्याति मिल गई । उनकी कविता ' कुररी के प्रति तथा लेखमाला ' छायावाद ' गुलेरी जी की कहानी ' उसने कहा था ' की तरह ही उनकी अमर रचनाएँ हैं ।                    द्विवेदी युग की प्रायः सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में उन्होंने निष्पक्ष व निर्भीक आलोचना तथा विचारोत्तेजक लेख लिखे थे , जो अब प्रायः दुष्प्राप्य हो गये हैं । ' हिन्दी कविता ' ( हितकारिणी ) ' हिन्दी का रूप क्या हो ' ' गीताञ्जलि में दुःख तथा ' कवि ' और उसका ' चरित्र ' उनके ऐतिहासिक महत्व के निबन्ध हैं । इनसे कवि के व्यक्तित्व व उसकी रचनाधर्मिता पर ही प्रकाश नहीं पड़ता वरन् दूसरे तीसरे दशक की खड़ी बोली के विकास पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है । उनके ये लेख साहित्य की अमूल्...