छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध:-मुकुटधर पांडेय ************************************* निवेदन ---------
छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध:-मुकुटधर पांडेय
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पण्डित मुकुटधर पांडेय हिन्दी के उन शीर्षस्थ यशस्वी साहित्यकारों में से एक हैं जिन्हें उनकी एक दो रचनाओं से ही यथेष्ट ख्याति मिल गई । उनकी कविता ' कुररी के प्रति तथा लेखमाला ' छायावाद ' गुलेरी जी की कहानी ' उसने कहा था ' की तरह ही उनकी अमर रचनाएँ हैं ।
द्विवेदी युग की प्रायः सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में उन्होंने निष्पक्ष व निर्भीक आलोचना तथा विचारोत्तेजक लेख लिखे थे , जो अब प्रायः दुष्प्राप्य हो गये हैं । ' हिन्दी कविता ' ( हितकारिणी ) ' हिन्दी का रूप क्या हो ' ' गीताञ्जलि में दुःख तथा ' कवि ' और उसका ' चरित्र ' उनके ऐतिहासिक महत्व के निबन्ध हैं । इनसे कवि के व्यक्तित्व व उसकी रचनाधर्मिता पर ही प्रकाश नहीं पड़ता वरन् दूसरे तीसरे दशक की खड़ी बोली के विकास पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है । उनके ये लेख साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं । अभी तक उनकी उपलब्धियों का श्रेष्ठ संकलन नहीं हो पाया था । इस अभाव की पूर्ति के लिए यह एक . छोटा सा प्रयास है ।
छायावाद लेखमाला तो हिन्दी कविता का एक दर्शन ही है । इसकी खोज बीस - पच्चीस वर्षों से जारी थी , लेखमाला का किसी को एक निबन्ध मिला तो किसी को दूसरा । लेकिन इसकी जरूरत बराबर बनी रही । एक दो पत्तांशों से इस महत्व को समझा जा सकता है ।
' आपकी श्री शारदा वाली लेखमाला यदि छप जाती तो बड़ा उपकार होता । उसके कतिपय उद्धरणों से जो दो चार शोध प्रबन्धों में उद्धृत हुए हैं , शोध छात्र लाभ उठा पाते हैं । फिर भी सम्पूर्ण विचारों को जानने की उत्कण्ठा बनी रहती है । क्या वे उपलब्ध नहीं हो सकते ? "
१-२-६४। आचार्य विनय मोहन शर्मा
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
' आप छायावाद के प्राथमिक विवेचकों में हैं और आपने जो लेख १६२० में श्री शारदा में लिखे थे उनका मेरे कार्य के लिए बड़ा सम्बन्धित महत्त्व है , मैं छायावाद से आप जैसे विद्वज्जनों के लेखों का संग्रह तैयार करना चाहता हूँ , जिससे यह स्पष्ट हो सके कि विविध समय में विद्वानों के छायावाद के सम्बन्ध में कैसे विचार थे । इस साहित्यिक कार्य में आपकी अत्यन्त्यावश्यक है , श्री शारदा के अंक मुझे कहाँ देखने को मिल सकते हैं । कृपया कष्ट करके बतावें । मैं छायावाद का तुच्छ विद्यार्थी रहा हूँ | आप मेरी सहायता करें । '
डॉ ० केशरी नारायण शुक्ल
लखनऊ
इसी प्रकार की जिज्ञासा आ ० अंचल , शांतिप्रिय द्विवेदी , नर्मदा प्रसाद खरे , डॉ ० रामेश्वर गुरु आदि ने किये हैं । आज आपके समक्ष वह ऐतिहासिक लेखमाला मूल रूप में प्रस्तुत है । इसकी उपलब्धि की एक रोचक कहानी है ।
पण्डित मुकुटधर पाँडेय का एक लेख सन् ८३ में कादम्बिनी में प्रकाशित हुआ तो मध्य प्रदेश के बाहर के अनेक विद्वानों को आश्चर्य हुआ कि पाँडेय जी अभी भी जीवित हैं । इस सम्बन्ध में श्री क्षेमचन्द्र सुमन का नाम उल्लेखनीय है । कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाएँ पत्र स्वरूप मिलीं । कुछ ने पांडेय जी के बारे में विस्तृत जानकारी चाही । उनमें से एक हैं डॉ ० मनोहर लाल ( प्राध्यापक , श्री राम कामर्स कालेज , दिल्ली ) , उन्होंने पांडेय जी को पत्र लिखा । पाँडेय जी की कृपा से उनके साथ मेरा पत्राचार हुआ । मैंने उनके आग्रह पर ' पूजा फूल ' की कुछ कविताएँ भेजी ( पूजा फूल भी दुष्प्राप्य है ) । उन्होंने मेरे निवेदन पर पांडेय जी की कविताओं और लेखों की खोज की और पांडेय जी के माध्यम से मुझे उपलब्ध कराया । इसी सिलसिले में मारवाड़ी वाचनालय दिल्ली से वह ऐतिहासिक लेखमाला मिली । तत्काल उन्होंने फोटो स्टेट कॉपी भेज दी । उनकी उदारता का दूसरा उदाहरण नहीं ।
पिछले चार - पांच वर्षों से मैं पाण्डेय जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक स्वतन्त्र किताब लिख रहा था । इस बीच तीस - चालीस पुस्तकों से मैंने लेख माला के उद्धरणों को एक क्रम में रखकर देखा । एक छोटा सा लेख तैयार हो गया , उसे मैंने पाण्डेय जी के समक्ष प्रस्तुत किया , उन्होंने अनेक रोचक बातें बतलाई | छायावाद पर जब मेरा लेख लगभग तैयार हो रहा था कि ' लेखमाला ' समूचे रूप में प्राप्त हुई । इसके पारायण के बाद मालूम हुआ कि इसकी पूर्व पीठिका तो हितकारिणी में प्रकाशित उनकी ' कविता ' शीर्षक लेखमाला है । फिर हितकारिणी में ही कुछ चौंकाने वाली बातें मिलीं । पाण्डेय जी को उनकी एक प्रकाशित रचना ' चरण प्रसाद ' दिखलाई तो लगभग उनकी आँखें गीली हो गयीं ( ' ज्योत्स्ना ' में अब वह संकलित है ) मैंने एक टिप्पणी लिखी । महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं और अधिकारी विद्वानों को उसकी प्रतियाँ भेजी । यहाँ उसे उद्धृत किया जाता है ।
छायावाद जितना विवादास्पद है , उतना ही दिलचस्प , यही कारण है , आज भी वह शोध का विषय बना हुआ है , छायावाद नाम किसने और कब दिया ये प्रश्न अभी तक अनुत्तरित हैं । छायावाद शीर्षक आलोचना की किताब में ( सन् १६४५ ) डॉ ० नामवर सिंह ने जुलाई , सितम्बर , नवम्बर और दिसम्बर १६२० की “ श्री शारदा " ( जबलपुर ) में प्रकाशित पं ० मुकुटधर पांडेय की लेखमाला को छायावाद विषयक प्रथम , प्रामाणिक और मौलिक लेख कहा था । तब से अब तक छायावाद के विषय प्रवर्तन का श्रेय पद्मश्री मुकुटधर पांडेय तथा जबलपुर से निकलने वाली पत्रिका " श्री शारदा " को दिया जाता रहा है , लेकिन अब श्रेय की अधिकारिणी अकेली “ श्री शारदा " नहीं बल्कि उसकी बड़ी बहन हितकारिणी भी है ।
श्री शारदा की प्रारंभिक पंक्तियाँ हैं " हिन्दी में यह एक बिलकुल नया शब्द है अंग्रेजी या किसी पाश्चात्य अथवा बंग साहित्य की जानकारी रखने वाले तो सुनते ही समझ जायेंगे कि यह शब्द मिस्टिसिज्म के लिए आया है । हिन्दी में इसका नितान्त अभाव था । ( १३ सितम्बर , १६२० श्री शारदा पृ ० ३४० ) इसके वर्ष भर बाद सरस्वती में उनका ' कविता ' शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ जिसके अनुसार , कबीर , दादू , मीराबाई , आदि छायावाद के क्षेत्र में बहुत कुछ भ्रमण कर चुके हैं । बंग साहित्य में आध्यात्मिकता की जो बाढ़ आई है , उसमें हमारे इन कवियों का गुप्त हाथ रहा है । बंगाल में " छायावाद " के प्रवर्तक कवीन्द्र रवीन्द्र इस श्रेणी की कविता से पूर्ण परिचित हैं तथापि आज हमें “ छायावाद " को नवीन कहना पड़ रहा है , इसीलिये कि मध्य में उसका ह्रास हो गया था । पुनश्च इसमें पश्चिमी प्रभाव भी सन्निविष्ट है । ( सरस्वती , दिसम्बर १९२१ )
इसके बाद मुकुटधर जी का मिस्टिसिज्म का पर्याय शीर्षक एक और लेख माधुरी में प्रकाशित हुआ । उसकी ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं । " इसके लिए बंगाल में जहाँ तक हमें ज्ञात है , अभी तक कोई शब्द गढ़ा नहीं गया है , वे मूल शब्द ही लिखा करते हैं । ( १६ अप्रैल , १६२६ माधुरी ) उपर्युक्त उद्धरणों से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की धारणा का ( कि छायावाद बंगला से आया है ) खंडन तो हो ही जाता है , इससे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अवन्तिका १६५४ काव्यांक में प्रकाशित लेख पर भी प्रकाश पड़ता है जिसमें उन्होंने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की धारणा का खंडन किया था । " यह शब्द बिलकुल नया है । यह भ्रम ही है कि इस प्रकार के काव्यों को बंगला में छायावाद कहा जाता है । " उपर्युक्त उद्धरणों से यह तो निर्विवाद सिद्ध है कि बंगला साहित्य में छायावाद के प्रथम कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं और हिन्दी में प्रथम प्रयोक्ता कवि पं ० मुकुटधर पांडेय ही हैं , फिर भी इसके प्रकाशन का श्रेय अकेले श्री शारदा को नहीं दिया जा सकता , कारण ५-२ १६१८ को लिखित और हितकारिणी में प्रकाशित मुकुटधर पांडेय की लेखमाला हिन्दी कविता ; श्री शारदा में प्रकाशित छायावाद लेखमाला की पूर्वपीठिका है । इस लेखमाला में छायावाद के भाव स्वातंत्र्य , नवीनता और मौलिक प्रतिभा तथा प्रकृति की रहस्यमयी चेतना की अभि व्यक्ति और आनन्दानुभूति पर विस्तार से चर्चा की गई है । इस लेखमाला में भले ही छायावाद शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है लेकिन नवीन युग या परिवर्तन युग की बार - बार चर्चा की गई है किन्तु हितकारिणी में ही प्रकाशित पंडित मुकुटधर पांडेय की " चरण प्रसाद " कविता , जो विद्वानों की निगाह से अब तख बची रही । छायावाद की सटीक और संक्षिप्त परिभाषा है । इन्हीं पंक्तियों से हिन्दी काव्यधारा में छायावाद शब्द का प्रथम प्रयोग हुआ है वे ऐतिहासिक और अमर पंक्तियाँ हैं : -
भाषा क्या वह छायावाद है
न कहीं उसका अनुवाद
( हितकारिणी मार्च , १६२० प्रथम पृष्ठ )
जो युवा कवि मुकुटधर पांडेय की अवचेतना में विद्युत् तरंग जैसी चमकती रही होंगी और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के भावना योग , अपरोक्ष ज्ञानवाद तथा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा प्रयुक्त भक्तिवाद या अध्या त्मवाद की जगह उन्होंने मिस्टिसिज्म के लिए छायावाद नाम दिया यह जानते हुए कि यह उसका पर्यायवाची शब्द नहीं है , वास्तव में पांडेय जी के सामने एक शैली थी , जो लाक्षणिक थी । ऐसी शैली की रचनाओं के भाव स्पष्ट नहीं थे , उसमें एक धुंधलापन था , मानों वे भाव नहीं भावों की छाया हो । अभिव्यक्ति की सांकेतिक शैली के अर्थ में इस प्रकार उन्होंने " छायावाद " का नामकरण किया ।
छायावाद शब्द के प्रचलन के पूर्व हिन्दी में छायानुवाद , भावानुवाद या छाया शब्द प्रयोग में थे और पांडेय जी को इन शब्दों से विशेष मोह था , ऐसा उनकी कविताओं से आभास होता है । पांडेय जी के शब्दों में छाया शब्द नया नहीं था , हिन्दी में छायानुवाद शब्द का प्रचलन था । संस्कृत में ' कविरनुहरति छायाम् ' यह उक्ति प्रसिद्ध थी । गोसाई जी ने गूढ़ प्रेम के संबंध में कहा था , ' कहहु सप्रेम प्रकट को करई , केहि छाया कवि मति अनुसरई । ' उपर्युक्त तथ्यों के प्रकाश में कहा जा सकता है । " छायावाद का प्रयोग आप्त वाणी जैसा ही था , स्वतः स्फूर्त और परम पूर्ण |
" पं ० मुकुटधर जी पर स्वतन्त्र किताब लिखते समय मुझे उनसे तथा अन्य मित्रों से एवं पत्र - पत्रिकाओं से कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशित अप्रकाशित रचनाएँ मिली हैं , जो संख्या में चार सौ से ऊपर होंगी । दो वर्ष पूर्व इन्हें " प्रतिनिधि रचनाएँ " शीर्षक से प्रकाशित कराना चाहा था । समय ने साथ नहीं दिया , अस्तु अभावों में ये महत्त्वपूर्ण रचनाएँ फाइलों में बन्द रहीं । इस बीच " छायावाद एवं अन्य निबन्ध " तथा " स्मृति पुंज " शीर्षक पुस्तकें प्रकाशित हो गयीं , इनमें प्रस्तुत संकलन के कुछ लेख शामिल हैं , किन्तु इस किताब में कुछ निबन्ध बिलकुल नये और अप्रकाशित हैं , कुछ विलुप्त से हो गये थे । यहाँ प्रथम बार उन्हें प्रकाशित किया जा रहा है ।
प्रथम सात निबन्ध द्विवेदी युग में लिखे गये है कालिदास का आदर्श स्थापन , छायावाद ( ८३ ) अभी हाल के लेख हैं । शेष ६० से ८० के बीच लिखे गये हैं , इनमें कुछ प्रकाशित तथा कुछ अप्रकाशित रह गये थे । संस्मरण एवं यात्रा वृतान्त रोचक व ज्ञानवर्धक तो हैं ही , साथ ही हिन्दी साहित्य के इतिहास को समझने में सहायक हैं । आशा है , सुधी पाठक इनसे लाभान्वित होंगे ।
छत्तीसगढ़ लेखक संघ के संस्थापक उत्तम गोसाईं , डॉ ० मनोहर लाल , अशोक कुमार झा , डॉ ० बिहारी लाल साहू , सुरेन्द्रमणि त्रिपाठी , बसन्त बहिदार का मैं आभारी हूँ , जिनके सहयोग के बिना यह कार्य सही ढंग से नहीं हो पाता । अन्त में मैं आदरणीय पाण्डेय जी का कृतज्ञ हूँ , जिन्होंने ८८-८९ वर्ष की उम्र भी मेरी शताधिक बार कृपापूर्वक सहायता की है ।
रायगढ़ ,
१५ अगस्त , १९८३ डाँ.बलदेव
छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध
पं.मुकुटधर पांडेय, संपादक, डाँ. बलदेव
प्रकाशक, श्रीशारदा साहित्य सदन,रायगढ़
प्रस्तुति:-प्रकाशक:-बसन्त राघव साव
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