मेवाड़ गाथा के अमर गायक(पं.लोचन प्रसाद पांडेय) **************************************** डाँ. बलदेव

 

मेवाड़ गाथा के अमर गायक(पं.लोचन प्रसाद पांडेय)
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डाँ. बलदेव

                  द्विवेदीयुग के रचनाकारों को समझने के पूर्व भारतेन्दु युग की काव्य प्रवृत्तियों को समझ लेना चाहिए । भारतेन्दु पर टिप्पणी करते हुए आचार्य शुक्ल ने लिखा है- ' देश दशा अतीत गौरव आदि पर उनकी कविताएं या तो नाटकों में रखने के लिए लिखी गई अथवा विशेष अवसरों पर जैसे प्रिंस आफ वेल्स ( पीछे सम्राट सप्तम एडवर्ड ) का आगमन , मिश्र पर भारतीय सेना द्वारा ब्रिटिश सरकार की विजय पढ़ने के लिए । ऐसी रचनाओं में राजभक्ति और देश भक्ति का मेल आजकल के लोगों को कुछ विलक्षण लग सकता है । उपाध्याय पं . बदरीनारायण चौधर उनकी टिप्पणी है- ' कांग्रेस के अधिवेशन में वे प्रायः जाते थे । ' हीरक जयन्ती ' आदि की कविताओं को खुशामदी न समझना चाहिए । उनमें देश दशा का सिंहावलोकन करते थे और मार्मिकता के साथ द्विवेदी युगीन कवि रायदेवी प्रसाद पूर्ण पर भी उनकी टिप्पणी दृष्टव्य है - भारतेन्दु प्रेमधन आदि प्रथम उत्थान के कवियों के समान पूर्णजी में भी देशभक्ति और राजभक्ति का समन्वय पाया जाता है । बात यह है कि उस समय तक देश के राजनीतिक प्रयत्नों में अवरोध या विरोध का बल नहीं आया था और लोगों की पूरी तरह धड़क नहीं खुली थी । अतः उनकी रचना में यदि एक ओर स्वदेशी प्रेम , और देशभक्ति पूर्ण पद्य मिलें और दूसरी ओर सन् 1912 वाले दिल्ली दरबार के ठाठबाट का वर्णन तो आश्चर्य न करना चाहिए । '

      इस संदर्भ में डा . रामविलास शर्मा का यह कथन अधिक सटीक है ' लगता है कि जनता में नवचेतना फैलाने के लिए राजभक्ति की आड़ ली गयी थी । '

          यहां आचार्य शुक्ल के कथनों को विस्तार से इसलिए दिया गया है कि द्विवेदी युग के प्रायः सभी कवियों में यह प्रवृत्ति कमोवेश पायी जाती है । पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय ने भी राजभक्ति की कविताएं लिखी है । बालविनोद पाण्डेय जी की प्रसिद्ध कृति है । और यह बालकों के चरित्र निर्माण के लिए लिखी गयी थी । पहली कविता ईश विनय है । इसमें दो गीत है प्रभु ! राजा रक्षा कीजै । ' लेकिन इन्हीं गीतों में ये भी पंक्तियां हैं ' - ' भारत सुख आलम हो , प्रजा सुखी निर्भय हो । ' इतना ही नहीं पांडेय जी ने सम्राट स्वागत एवं भक्ति पुष्पांजलि शीर्षक गुटका भी प्रकाशित कराई थी । जिसमें पंचम जार्ज की स्तुति के साथ ही रायगढ़ , सारंगढ़ और वामण्डा नरेशों का भी परिचय दिया गया है । एक और कविता राजा की जय शीर्षक पांच सवैयों की रचना हितकारिणी में भी प्रकाशित हुई थी । लेकिन इन कविताओं में भी देश दुर्दशा , देशभक्ति और राजभक्ति का सम्मिश्रण है , पाण्डेयजी पर कुछ देशी रियासतों का प्रभाव था , लेकिन शीघ्र ही वे इस प्रवृत्ति का त्याग कर दिये । इस संदर्भ में शोकोस्वास का उल्लेख कर देना भी अप्रासंगिक न होगा । इस पुस्तिका का प्रकाशन सन् 1910 में एडवर्ड सप्तम की मृत्यु पर हुआ था । दरअसल यह 12 पृष्ठों का एक शोकगीत है , लेकिन इसमें विशुद्ध मानवीय करुणा की अभिव्यक्ति हुई है। इसे राजभक्ति की कविता मानना गलत होगा आगे चलकर पाण्डेय जी राष्ट्रवादी हो गये थे ।

      पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय कट्टर देश भक्त थे । राजभक्ति पर लिखी कविताओं से उन्हें बाद में बड़ी आत्मग्लानि हुई थी । ' मेवाड़ गाथा ' जैसी ओजस्वी काव्य को प्यारे ब्रजेश्वर ' को सौंप हुए उनकी आत्म ग्लानि फूट पड़ी है , ' धन से इतर वस्तु अर्थात् प्रेम , स्नेह , दया, देशभक्ति , जाति, प्रीत कृतज्ञता , उपकार , सहानुभूति , आत्माभिमान , आत्म प्रेम आदि धन की अपेक्षा अधिक मूल्यवान हैं तो फिर इन दासों की कृपा प्राप्ति के प्रयास में क्यों अपना व्यर्थ उपहास कराया । आगे चलकर उनकी वीर पूजा की भावना भी मुखर हो उठी है । यशोदा नन्दन यह तुम्हारी प्राण प्यारी ब्रजभूमि भूषिता । सुर दुर्लभा भारत माता के उन महावीर प्रताप का वीर गान है । जिनके आत्माभिमान के बल से आज हिंदू जाति का शीश ऊंचा है । क्या इसे स्वीकार न करोगे ? वांच्छा कल्पतरु , तुम्हारे प्रिय भारत की वांच्छा पूर्ण करो । क्लेश नाशिन इस भूमि के क्लेशों को हरण करके इसे सुख दो , शान्ति दो । जगन्नाटक , सूत्रधार भारत के वे दिन फिर लौटें , बस यही प्रार्थना है।-
                                     लोचन प्रसाद

                  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सच्ची अभिव्यक्ति यदि कहीं देखना है तो द्विवेदी युगीन काव्य में ही देखना चाहिए । उस समय के हिंदू कवियों के सामने बड़ी मुश्किलें थी । वीर पूजा के लिए उन्होंने गौरवपूर्ण इतिहास के चरित नायक , महाराणा प्रताप और शिवाजी को देखा और अपनी रचनाओं में मुगल शासकों के अत्याचार और बर्बर हिंसा , शोषण आदि की खुलकर निंदा की जिसमें ' यवन ' और क्लेश शब्दों की बार - बार आवृत्ति पायी जाती है , जबकि उस समय देश में मुस्लिम लीग खूब सक्रिय थी , और अंग्रेज फूट करो राज्य करो का लाभ तो ले ही रहे थे । स्पष्ट है । यह अभिव्यंजना यवन या क्लेश तत्कालीन साम्राज्यवादियों के लिए थी । परन्तु मुस्लिम लीग रास्ता तो कुछ अलग ही दिखाई दे रहा था । उस समय आज जैसी हिंदू - मुस्लिम एकता की कमी थी । ऐसे कठिन समय में भी अपने लिए रास्ता निकाल लेना यह द्विवेदी युग के कवियों की समझदारी और बहादुरी का ही काम कहा जावेगा ।

               पं . लोचनप्रसाद पाण्डेय की मेवाड़ गाथा , वीर पूजा से पूर्ण रचना है । वह लाखों भारतीय युवकों का कंठहार थी । दरअसल मेवाड़ गाथा खण्ड - काव्य नहीं है , जैसा कि कुछ आलोचक कहते हैं , बल्कि वह आख्यानक रचनाओं का संग्रह है , दुर्गद्वार तथा प्रतापस्तवन तो स्तुति परक मुक्तकों के संग्रह हैं । आचार्य शुक्ल के अनुसार इसकी रचनाएं नंददास की रास पंचाध्याय के ढंग पर लिखी गयी है । मेवाड़ गाथा की कथा एक सूत्र में पूर्वा पर सम्बन्धों में आबद्ध नहीं , बल्कि कई कई प्रसंगों की लम्बी रचनाएं हैं । जैसे आत्म त्याग शीर्षक में चित्तौड़ के राणा भीम सिंह के अपूर्व त्याग का चित्रण है तो आदर्श राजभक्ति अर्थात् आत्मबलि में विख्यात झाला मानसिंह के उदार त्याग और वीरता का मर्मस्पर्शी वर्णन है ।
            मर्दन किया जो इस तुम्हारे
                           मान का मैने नहीं
           तो नाम मेरा मानसिंह नहीं ,
                          प्रतिज्ञा है यही
           पर सकोगे राज्य अब
                           राणा न तुम इस देश में
           जो वीर हो तो यों बने
                          रहियो , विपद में क्लेश में
            उत्तर मिला अब के कभी
                           जब आप आवें यहां
             निज पूज्य अकबर तुर्क को
                           भी साथ में लावे यहां

          अकबर इस बात को सुन भड़क उठा । सलीम की सेना और राणा की सेना की मुठभेड़ हल्दी घाटी में हुई । सलीम और प्रताप के लोम हर्षक युद्ध का चित्रण करने में यहां पाण्डेय जी की लेखनी भी जीवन्त हो उठी है ..
             वे गजारूढ़ सलीम हैं , ये हयारूढ़
                                                प्रताप है
            ये  कर  रहे  आघात , रक्षा  कर  रहे
                                               वे आप हैं
            है  एक  अपना   पैर  हाथी  पर रखे
                                            चेतक खड़ा
            है  देखते  राणा  सकोप  सलीम को
                                              भाला बढ़ा

   भादड़ी के सरदार झाला मानसिंह ने निज प्राण देने की ठान प्रताप के सिर से राजछत्र अपने शिर पर ले लिया फिर भयंकर युद्ध छिड़ गया । चेतक पर सवार राणा युद्ध से दूर जा रहे थे । चेतक घायल हो गया था , फिर भी वह वायु वेग से भागा जा रहा था । खुशरानी आदि सुलतानी सरदार पीछा कर रहे थे । उनका वाण चेतक पर लगा तभी दो तीर यवनों को लगा । राजा शक्तिसिंह हुंकार उठे ..
              रे नीचे यवनों ! यद्यपि हूं मैं अब ,
                                       तुम्हारे पक्ष मे
             है , विमल   क्षत्रिय  रुधिर  बहता ,
                                   किन्तु मेरे वक्ष में
            अन्याय  से  आक्रमण  होते  पूज्य
                                     अग्रज पर हहा !
            मैं  शक्ति  सिंह खड़े किस हृदय से
                                           देखूं   यहां
            अग्रज  पुनः  राजा  पुनः  वर  बीर   
                                      रक्षा भी , अहा !
            है जब कराल कृतघ्नता तो पुण्य है
                                      फिर क्या यहां ?
            क्या  जन्म  भूमि  तथैव अपने भूप
                                         को देना भला
            है पुण्य पुन्ज कृतज्ञता निज रूप को
                                               देना भुला
            पय  पान  जननी का किया है किन्तु
                                         जिनके संग में
            है   एक  ही  जब  रुधिर   दोनों   के
                                       सुपावन अंग मे
           होता , न   करता    भूप  भ्राता   को
                                    स्वरिपु से त्राण मे
           तो   देशद्रोही , मातृद्रोही ,   देशद्रोही
                                             क्या न   मै

     ' नीला घोड़ारा असवार ' का सहसा शब्द सुनकर राजा प्रताप मुड़े । अलौकिक शक्ति से युक्त चिरकाल से बिछुड़े परमप्रिय शक्ति को देख हर्ष से वे गदगद हो उठे । ' चेतक ' स्वर्ग सिधार गया , राजा दुखी थे , शक्ति ने उन्हें ओंकार नामक अश्व दिया और इस तरह शक्ति से बिदा हो राजा सुरक्षित स्थान पर पहुंचे ।

      इसी प्रकार अपूर्व दानशीलता त्याग और उदारता का आख्यान है ' स्वाभिमानी मंत्री । ' मुगलशाही के बार - बार आक्रमण से राजा प्रताप विपन्न हो जाते हैं फिर भी उनका मनोबल ऊंचा है पाण्डेय जी के शब्दों में -
              हो जावें क्यों न मेरी तन धन जन
                              की और सर्वस्व हानि
              रखूंगा  मैं  प्रतिष्ठा    स्वपितरगण
                        की छोड़ के आत्म - ग्लानि 

         लेकिन मेवाड़ पर आपत्ति के बादल गहराते ही रहते हैं , पददलित मेवाड़ की रक्षा करने में विफल प्रताप फिर - फिर आत्मग्लानि से भर जाते हैं -
             मैं , हे मेवाड़ माता ! अधम  तनय
                               हूं  दुख का मूल मेरा
            सेवा तेरे पदों की कुछ न कर सका
                                     भिरू मैं देव प्रेरा
            तू  मा  मेवाड़  लक्ष्मी ! पद   दलित
                             हट्टा शत्रु से व्यर्थ होगी
            वीराम्बा !  पुण्य   भूमि !       प्रकट
                       यवन के पाप के अर्थ होगी ॥

      और एक दिन प्रताप मेवाड़ को प्रणाम कर सिन्धु प्रान्तस्थ मरू भूमि में पहुंच जाते हैं । इस समाचार से उनका वृद्ध मंत्री भामाशाह अत्यंत शोकाकुल हो जाता है और घोड़े पर सवार हो वहां सत्वर पहुंच कर यों निवेदन करता है -
               हां ! अर्धाभाव के हित नृप तजना
                                        चाहते हैं स्वदेश
              ऐसा कि किसी को उस दिन कहते
                                   था सुना हाय क्लेश
              हिन्दू  सूर्य  प्रतापी  प्रखर  तर कहां ,     
                                     शक्तिशाली प्रताप
              पीड़ा - क्रीड़ा अपूर्व प्रबल अति कहा
                                     ( विन्ध अर्थान्ताप )

        यहां भामाशाह के माध्यम से स्वतंत्र चेताकवि परतंत्रता को घोर काली निशा कहता है , जहां कुल की गरिमा लुप्त हो जाती है , और लोग मृत्यु की ओर उन्मुख हो जाते हैं -
            जावेंगी मातृ जो निकल कर कभी
                                 हाथ से हां ! हमारे
            तो  क्यों  निर्जीव  प्राणी  सम  हम
                       सब है व्यर्थ ही प्राण धारे

            शाह भामा स्वयं को धिक्कारते हुए रक्तपूर्ण अश्रुधार बहाते हैं और शोक संतृप्त प्रताप हिम्मत हारने लगते हैं अपने बच्चों का दुख उनसे नहीं देखा गया ... -
              रोते हैं राजपुत्र क्षुधित दुखित हो
                                अम्ब की ओर देख
              छाती जाती फटी है तब इस शठ
                                की हाय रे कर्म रेख
             ऐसी  दीना  दशा में कब तक रिपु
                           से युद्ध हा हां करूंगा ?
            क्या श्री स्वाधीनता को अकबर कर
                            मैं सौंप स्वाहा करूंगा।

           शत्रु सेना पीछे है , प्रताप धन जन से दीन हैं । भामाशाह शोकार्त राणा के पैरों में गिर प्रार्थना करते हैं : -
              मेरा सर्वस्व ही है तन सहित प्रभो
                                भूपते ! आप का ही
             भागी  हूंगा  न  दूं  तन मन नृप के
                                  हेतु मैं पाप का ही
             जूता  मैं  श्री  पदों  के  हित  यदि
                          बनवा देह की चर्म से दू
             तो  भी है  हाय ! थोड़ा  यदि क्षण
                                   को मूढ़ मैं धर्म से
             कीजै  रक्षा प्रजा की इस धन बल
                          से देश की जाति की भी
            कीजै  हे भूप ! रक्षा  इस  धन बल
                        से वंश की ख्याति को भी

        अन्त में राणा प्रताप वृद्ध मंत्री के अनुनय विनय पर पसीज जाते हैं , उनके हृदय से उद्गार फूट पड़ता है : -
              मन्त्री या हो गया मैं सुचतुर तुम
                       सा आज भामा ! कृतार्थ
             भेजा  क्या  मात - भूनेश्वर   कर
             तुमको   देश    रक्षा       हितार्थ
                                         ( चर - दूत )

                      और राणा मातृ भूमि के उद्धार करने परिजनों को साथ ले मेवाड़ की ओर लौट पड़ते हैं । भामाशाह ने बारह वर्षों तक पच्चीस हजार मनुष्यों के जीवन निर्वाह इतना धन देश भक्त प्रताप को देकर अपनी स्वभक्ति को प्रदर्शित किया । इसी प्रकार की तेजस्विता से पूर्ण रचना प्रतापी प्रताप है -
              चाहे कोई मान बेचकर अकबर के
                                           मृदु कर चूमै
              चाहे  कोई  महाराज  बन  सिर पर
                                           छत्र धर  घूमै
              कुछ भी हो पर कुल मर्यादा तज मै
                                     विपथ न जाऊंगा
              ईश्वर  के  अतिरिक्त   किसी     को
                           अपना सिर न झुकाऊंगा ।

           राणा प्रताप स्वतंत्रता के लिए जंगल - जंगल फिरते रहे परन्तु उन्होने अकबर की अधीनता कभी स्वीकार न की । पं . लोचनप्रसाद पाण्डेय ने राणा प्रताप के महत्व को इन पंक्तियों में स्वीकार किया है-
               हे  भारत  के  गौरव  केतन !
              स्वाभिमान  के शुभ  अवतार
              हे राजर्षि ! स्वदेश  प्रेम  निधि
              शौर्य  साहस  शक्ति     अपार
              हे प्रताप ! हे आत्म त्यागी,महा
              प्रतापी ,   धार्मिक।         धीर
             क्या  कोई  इस  भारत भूमि मे
             प्रकटेगा  फिर  तुझ   सा   वीर

        इस प्रकार हम देखते हैं , मेवाड़ गाथा के माध्यम से राष्ट्रीय विचारधारा के अनन्य कवि पं . लोचनप्रसाद पाण्डेय ने अपनी देश भक्ति का साहस पूर्ण परिचय दिया है ।

("साहित्य वाचस्पति पं. लोचन प्रसाद पांडेय"समीक्षा ग्रंथ:-लेखक डाँ. बलदेव,2006से साभार ,पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी पर लिखें गये सभी लेख 1984 के सप्ताहिक केलो प्रवाह, रायगढ़ में प्रकाशित है।)

प्रस्तुति:-बसन्त राघव, पंचवटी नगर, बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़,

Mai bhi sochi pata nai kya bat ho gai...
🤔🤔😆😆😆

मो.नं.8319939396

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