कविता, पं.मुकुटधर पांडेय
कविता ( 1 )
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मुकुटधर पांडेय
(छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध. संपादक:डाँ बलदेव)
कविता एक स्वर्गीय वस्तु है । उसके पाठ से अशान्त मानस को शान्ति मिलती है । मनुष्य चाहे परिश्रम से कितना ही क्लान्त क्यों न हो गया हो , कविता - पाठ से उसकी सारी थकावट दूर हो जाती है और उसका उदास - चित्त फिर हरा - भरा होकर दूने उत्साह और जोश से कार्य करने के योग्य हो जाता है । मजदूर काम करते हुए , स्त्रियाँ चक्की पीसती हुई , किसान हल जोतते हुए गीत गाते हैं । यह इसलिए कि इससे उनका परिश्रम कम हो जाता है और काम करने में जी लगता है ।
थके - मांदे उदास - चित्त किसान और मजदूरों पर उक्त ग्राम्य गीतों का जो अद्भुत प्रभाव पड़ता है वही प्रभाव एक स्थान - भ्रष्ट , उद्देश्यहीन , अकर्मण्य और पतनोन्मुख देश अथवा जाति पर कविता का पड़ता है । यही कारण है कि कविता ने समय - समय पर संसार में भीषण क्रान्ति उपस्थित कर दी है । इस बात के उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं । इतिहास में इसके सैकड़ों प्रमाण मिलते हैं ।
कविता अपनी इसी शक्ति के कारण संसार में एक अनुपम वस्तु समझी जाती है । कविता निराशा में आशा का संचार करती , उदासीनता में प्रसन्नता लाती , विपत्ति में धैर्य देती और मनुष्य को कर्मण्य बनाने में सहायक होती है । वह हृदय की मुरझी हुई विचार - कलियों को खिलाती , अन्तःकरण की सुषुप्त वृत्तियों को जागृत करती और मनुष्य के मृतप्राय स्वाभाविक सद्गुणों में चैतन्यता लाती है । इससे सिद्ध होता है कि कविता केवल मनोरंजन का ही साधन नहीं है , वरन् वह देश अथवा जाति के अस्तित्व को बनाये रखने और मनुष्य के प्रकृत भावों को जागृत रखने अथवा यह कहिए , मनुष्यत्व को स्थिर रखने के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है । यह तो हुआ कविता का ' महत्त्व वर्णन ' । अब हम कविता - विषयक अन्य बातों का वर्णन करते हैं ।
आजकल जब कोई नवयुवक साहित्य क्षेत्र में प्रवेश करता है तब वह कविता लेखन से ही अपना कार्य आरम्भ करता है । इससे यह जाना जाता है कि नवयुवक का चित्त कविता की ओर सर्वप्रथम आकर्षित होता है । इसका दूसरा कारण है - कवि बनने की उत्कट अभिलाषा । उनके इस आचरण से साहित्य में कूड़ा - कचरा तो जरूर भर जाता है , पर इससे उसे कुछ भी लाभ नहीं पहुँचता , यह नहीं कहा जा सकता । सम्भव है कि इन नवयुवकों में से कोई आगे चलकर ' सुकवि ' और ' महाकवि ' का भी पद प्राप्त कर लें ? यों तो साधारणतया ' कविता ' शब्द का प्रयोग छन्दोबद्ध वाक्य अथवा वाक्य समूह के लिए किया जाता है , पर यथार्थ में यह बात नहीं है । हमें स्मरण रखना चाहिए कि कविता और पद्य एक ही वस्तु का नाम नहीं है । हृदय ग्राही भाषा के चित्र का नाम कविता चाहे वह छन्दोबद्ध हो या गद्य में हो और छन्द - शास्त्र के नियमानुकूल परिमित शब्द - समूह का नाम पद्य है । कविता प्रभावोत्पादक और मनोरंजक होती है , पर पद्य में ये गुण नहीं पाये जाते । आजकल हिन्दी के मासिक पत्रों में कविता के नाम से जो रचना प्रकाशित होती है , उनमें अधिकांश प्रायः पद्य ही होते हैं । इन पद्यों को ' कविता ' नहीं ' तुकबन्दी ' कहना चाहिए और उनके लेखकों को ' कवि ' न कह कर ‘ पद्य - लेखक ' या तुक्कड़ कहना अधिक उपयुक्त होगा । कविता के लक्षणों से हीन निरे छन्द लिखने वालों को ' कवि ' कहना मानों उस शब्द का दुरुपयोग करना है । यह नहीं कहा जा सकता कि ' पद्य ' की कोई आवश्यकता ही नहीं है । हिन्दी में ही नहीं प्रत्येक भाषा में ' पद्य ' पाये जाते हैं और उनसे बहुत कुछ काम भी निकला करता है ।
आजकल लोगों की यह धारणा हो गयी है कि बिना काव्य के भेद और व्यंग्य , रस , अलंकार आदि विषयों का सम्यक् ज्ञान प्राप्त किये कोई कदापि कवि नहीं हो सकता । उनके विचार में कविता में यमक , अनुप्रास और उक्ति आदि की बहुलता न हो , वह कोई कविता ही नहीं । कविता करने के लिए उक्त विषयों का अध्ययन अत्यावश्यक नहीं कहा जा सकता । जो लोग कविता करते समय अलंकार आदि का अधिक ध्यान रखते हैं उनकी कविता प्रायः बिगड़ जाया करती है । इसका कारण यही है कि वे अलंकार आदि का अधिक ध्यान रखते हैं । भाव ही कविता का प्राण है जहाँ तक भाव - प्रकाशन में कोई बाधा न हो वहीं तक अलंकार का प्रयोग करना चाहिए । कविता को सुस्वर और श्रुति - सुखद बनाने के लिए ही हमारे आचार्यों ने यमक , अनुप्रास आदि शब्दालंकारों की व्यवस्था की है पर यह नहीं कहा कि अनुप्रास के प्रयास में पड़ कर कविता के मुख्य गुणों को भुला देना चाहिए । जो यमक , अनुप्रास आदि कविता के स्वाभाविक प्रवाह - मार्ग में आ मिलें वे ही ग्रहण करने के योग्य हैं । जो सुकवि हैं उनकी रचना स्वभाव से ही सालंकार होती है । यही कारण है कि गद्य और पद्य की शैली में और भाषा के रूप में भी सर्वत्र कुछ न कुछ विभिन्नता पायी जाती है ।
यह कोई बात नहीं कि बिना व्यंग्य , रस , उक्ति आदि विषयों का अध्ययन किये कवि अपनी कविता में उनका प्रयोग कर ही नहीं सकता । उक्त विषयों में जिन बातों का वर्णन है , वे मानव - हृदय की स्वाभाविक उक्तियों और विकारों के प्रतिबिम्ब मात्र हैं । अतएव बिना ग्रन्थ - ज्ञान के ही हम उनका प्रयोग करते हैं । हाँ , उन विषयों के अध्ययन से हम अपनी स्वाभाविक उक्तियों और विकारों को प्रत्यक्ष देखते हैं ,
जिससे हमारे हृदयस्थ भाव जागृत होकर पुष्टता प्राप्त करते हैं ।
यह नहीं कहा जा सकता कि उक्त विषयों को ग्रन्थ रूप में प्रतिपादित करने में हमारे पूर्ववर्ती आचार्यों का मतलब केवल यही था कि कवि को कविता करने के पहले उनका अध्ययन करना ही चाहिए । कविता का पूर्ण - रसास्वादन करने के लिए कविता की आलोचना करके उसकी विशेषताओं को हृदयंगम करके अधिक आनन्द प्राप्त करने के लिए काव्य - प्रेमियों और कविता रसिकों के पक्ष में उनका अध्ययन अत्यावश्यक है । यथार्थ बात तो यह है कि कविता विषयक निर्धारित नियमों के पूर्ण - पालन से कविता का स्वाभाविक प्रवाह मन्द हो जाता है । कहा जाता है कि सभ्यता और कविता में अनबन है । यह इसीलिए कि जैसे - जैसे सभ्यता की वृद्धि होती है वैसे ही वैसे विद्या , कला आदि की सूक्ष्मता का भी अन्वेषण होता जाता है । प्रत्येक विषय के नये - नये ग्रन्थ बनते प्रत्येक विषय के नूतन तत्त्व हूँढ़े जाते हैं और नये - नये नियमों की सृष्टि भी की जाती है । इससे अन्यान्य विषयों को लाभ जरूर पहुँचता है । पर इन नियमों की वेड़ी पहन कर कविता परतन्त्र हो जाती हैं जिससे उसका स्वाभाविक - सौन्दर्य जाता रहता है । यही कारण है कि अब पहिले की - सी अच्छी कविता देखने में नहीं आती । प्राचीन युग में कविता के लिए अधिक नियमों का पालन नहीं करना पड़ता था । तब उसमें स्वाभाविकता और सरलता खूब पायी जाती थी । पर अब सभ्यता - वृद्धि के साथ - साथ कविता के इन गुणों का क्रमशः लोप हो रहा है ।
अब यह देखना चाहिए कवि बनने के लिए किस वस्तु की अत्यन्त आवश्यकता है । आवश्यकता है प्रतिभा की । यह ईश्वर - दत्त होती है । कवि इसे माँ के पेट से लेकर जन्म लेता है । हम देखते हैं कविता करने की स्वाभाविक - शक्ति सम्पन्न सभी लोगों में प्रतिभा पूर्णतया नहीं पायी जाती । बहुत कम लोग पूर्ण - प्रतिभाशाली होते हैं । ऐसे प्रतिभाशालियों की प्रतिभा का विकास भी सब समय नहीं हुआ करता । यही कारण है कि महाकवियों की भी रचना सर्वत्र समान प्रभावोत्पादक नहीं होती । प्रतिभा के विकास काल में कवि जो कुछ लिख लेता है वह ईश्वरीय वाणी के रूप में अत्यन्त हृदय - ग्राहक होता है । पर उसके मुकुलिय हो जाने पर कवि परिश्रम के बल से जो रचना करता है , वह प्रायः शिथिल हुआ करती है । यथार्थ में प्रतिभा का विकास कवि की इच्छा पर अवलम्बित नहीं है । प्रतिभा अपने विकास का सुयोग ढूँढ़ती रहती है । किसी घटना विशेष से अथवा कारण विशेष से , वह प्रकटित होती है । कई लोगों का कथन है कि अपस्मार , मृगी , उन्माद आदि के समान प्रतिभा भी मस्तिष्क का एक विकार है और वह समय के अनुसार कभी मन्द और कभी प्रबल हुआ करते है।
कवि लोग कविता करने के लिए एकान्त स्थल क्यों पसन्द करते हैं ? ऐसे स्थलों में बैठकर वे चित्त को एकाग्र करते और प्रतिभा देवी के आगमन की मार्ग - प्रतीक्षा करते रहते हैं । स्मरण रखना चाहिए कि कवि दूसरों के आग्रह अथवा दबाव से अपनी इच्छा के विरुद्ध जो कविता लिखता है वह कभी उत्तम नहीं हो सकती । चाहे कैसा भी बड़ा कवि क्यों न हो , वह ऐसे अवसरों में कदापि अच्छी कविता नहीं लिख सकेगा । इससे उस कवि का महत्त्व कुछ कम नहीं हो सकता । जब कवि को उसका अन्तःकरण कविता करने के लिए प्रेरित करने लगे , तभी उसे लेखनी उठानी चाहिए । इस अवस्था में वह जो कुछ लिखेगा वह प्रभावोत्पादक और सरस होगा । हम ऊपर लिख आये हैं कि भाव कविता का प्राण है । कवि का हृदय स्वभाव से ही भाव ग्रहण करने के योग्य होता है । कविता लिखने के समय भाव - रक्षा कवि का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए । प्रभावोत्पादक हृदयगत - भावों को ज्यों - के - त्यों शब्द द्वारा चित्रित कर देना ही काव्य - कला है । इस कृत्य में किसी तरह की पाबन्दी का अधिक ख्याल नहीं रखना चाहिए । जब घटना विशेष के दर्शन अथवा श्रवण से कवि के हृदय में भावाधिक्य के कारण तिल धरने की भी जगह नहीं रहती , तब से भाव शब्द रूप में बाहर निकलने लगते हैं , सच्ची कविता में भाव जरूर रहता है । जिस कविता में भाव न हो उसे समझना चाहिए कि यह प्रकृत - कवि की रचना नहीं है । यह एक ऐसे कवि की रचना है जो कवित्व - शक्ति को भी माँ के पेट से लेकर नहीं आया पर अपने अभ्यास और अध्यवसाय के बल कविता करता है ।
अभ्यास और अध्यवसाय
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अभ्यास और अध्यवसाय की आवश्यकता पूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए प्रकृत - कवियों को भी हुआ करती है । जो स्वाभाविक कवित्त - शक्ति से हीन होकर भी कविता करने की इच्छा करते हैं उनके लिए तो ये बातें अत्यन्त ही आवश्यक हैं । संसार में प्रकृत - कवियों की संख्या अधिक नहीं है । अधिकांश लोग ऐसे हैं जो अभ्यास और अध्यवसाय के बल से ही कवि हुए हैं । ऐसे कवियों का स्थान यद्यपि प्रकृत कवियों के स्थान से बहुत नीचा है तथापि उनसे संसार का कुछ कम उपकार नहीं होता । अध्यवसाय एक ऐसी वस्तु है कि उसके बल से स्वाभाविक कवित्व - शक्ति - हीन पुरुष भी अत्युत्तम कविता लिख सकता है । कोई - कोई साधारणतः पढ़े - लिखे होने पर भी ऐसी अच्छी कविता करते हैं कि उसकी समानता बड़े - बड़े पण्डितों की रचना भी नहीं कर सकती । पर जो अध्यवसाय के बल से कविता करने की इच्छा रखते हैं उन्हें विद्वान बनने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए । उनकी विद्वता जितनी चढ़ी - बढ़ी होगी उनकी रचना भी उतनी ही उपयोगिनी होगी । भावमयी कविता लिख कर पाठकों के हृदय पर तो अधिकार प्राप्त नहीं कर सकते क्योंकि यह केवल प्रकृत - कवियों का काम है पर उसके द्वारा सर्वसाधारण में ज्ञान और शिक्षा का प्रचार अवश्य करते हैं । इसमें सफलता प्राप्त करने के लिए उन्हें पाण्डित्य की बड़ी आवश्यकता पड़ती है । जहाँ प्रतिभा के पाण्डित्य का योग है वहाँ सोने में सुगन्ध समझिए । प्रकृत कवि जितने समय में एक पूरी कविता लिख लेगा उतने समय में अध्यवसाय - शील कवि केवल दो - चार लकीर ही लिख सकेगा और वह भी कठिनाई से । पर उक्त दोनों प्रकार के कवियों को पहिचानने की यह कोई कसौटी नहीं है ।
कविता - लेखन में शीघ्रता अथवा बिलम्ब सुयोग पर अवलम्बित है । प्रकृत - कवि प्रायः सब समय कविता नहीं लिख सकते । किसी अज्ञात शक्ति से उत्तेजित होकर ही वे कविता करते हैं । ऐसे अवसर पर वे कविता लिखे बिना रह ही नहीं सकते , चाहे उन्हें ऐसा करने से कोई कितना ही रोके । ऐसे ही अवसरों में वे बात की बात में अद्भुत करामात कर दिखलाते हैं । पर जब वे बिना इस उत्तेजना के कविता लिखने बैठते हैं , तब घंटों सिर - पच्ची करने पर भी अच्छी चीज नहीं बना सकते ।
प्रकृत - कवि और श्रम - सिद्ध कवि की कविता में जो बहुत बड़ा अन्तर है वह यह कि प्रथम प्रकार के कवि की कविता में भाव - बाहुल्य और द्वितीय प्रकार के कवि की कविता में ज्ञान अथवा बुद्धि - बाहुल्य होता है । भाव का वास - स्थान हृदय है ; अतएव हृदय ही प्रकृत - कविता - स्रोत का उद्गम स्थान है । पर ज्ञान अथवा बुद्धि का सम्बन्ध मस्तिष्क से है । इस कारण श्रम - सिद्ध कविता का आविर्भाव प्रायः मस्तिष्क से होता है । इन दोनों प्रकार के कवियों की कविता में कुछ और भेद है । श्रम - सिद्ध कवि शब्दाडम्बर का विशेष ध्यान रखता है जिससे उसकी कविता के अर्थ में न्यूनता आ जाती है । पर आश्चर्य तो यह है कि शब्दाडम्बर का इतना ख्याल रखने पर भी वह यथास्थान उपयुक्त शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता , जिससे उसकी कविता का चमत्कार कम हो जाता है । प्रत्येक भाषा में कई एक शब्द ऐसे होते हैं , जो स्थान भेद के अनुसार भिन्न - भिन्न अर्थ के द्योतक होते हैं । श्रम - सिद्ध कवि इन शब्दों का यथास्थान प्रयोग करने में प्रायः असमर्थ होता है । पर , प्रकृत कवियों को इसमें विशेष कठिनाई नहीं होती । वह अपनी कविता में स्थल विशेष के विचार से उपयुक्त और शक्ति - मान - शब्दों का प्रयोग करता है , जिससे उसके अर्थ की स्पष्टता और भाव भी बढ़ जाती है । प्रकृत कवियों को शब्दों की इस उपयुक्तता का ध्यान अधिक होता है । पर श्रम - सिद्ध - कवि शब्दों के उपयुक्त अर्थ और सारस्य की अवहेलना करके सम्पूर्ण वाक्य के अर्थ पर विशेष लक्ष्य देता है , किन्तु इसमें भी उसे पूर्णतया सफलता नहीं प्राप्त होती क्योंकि शब्दार्थ की विशेषता पर ही वाक्यार्थ की विशेषता अवलम्बित है ।
प्रकृत - कवि कविता करते समय उत्तेजना और भावावेश में आकर कुछ विक्षिप्ततापूर्ण कथन कर जाता है । उस समय वह एक ज्ञान - शून्य अवस्था में दृश्यभाव जगत से भिन्न कल्पना जगत् में विचरण करता रहता है । अतएव यथार्थ को भूल कर कभी - कभी विक्षिप्तों की नाई कुछ असम्भव कथन करते सुनते हैं तब हास्य पूर्वक कहते हैं कि ' यह कवि कल्पना है । ' कवि कल्पना में थोड़ा - बहुत मिथ्या का अंश भी रहता है । मिथ्या संसार में सर्वत्र अनादृत होती है । पर जब उसका संयोग कविता से हो जाता है तब लोग उसका अनादर न कर आदर करने लगते हैं । इस स्थल पर सभ्यता और कविता का पारस्परिक वैमनस्य फिर जाग उठता है । सभ्यताभिमानी लोगों को यह मिथ्या कविता असह्य हो जाती है और वे ऐसी कविता को जरा उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगते हैं । पर सभ्यता से जो लोग बचे हैं वे कवि - कल्पना में मिथ्या का अंश पाकर इस प्रकार नाक - भौं नहीं सिकोड़ते । सभ्यता के साथ - साथ लोगों में जो कारणानुसन्धान - शक्ति की वृद्धि हो रही है वही उनके इस रुचि - परिवर्तन का मुख्य कारण है । श्रम - सिद्ध - कवियों की रचना में न तो ऐसी विक्षिप्तता होती है और न कुछ असम्भव कथन होता है । वे जो कुछ लिखते हैं , सकारण और संयुक्ति लिखते हैं । उनकी कविता में गवेषणापूर्ण गम्भीर विचारों ही की अधिकता रहती है । इसीलिए उन्हें ज्ञान अर्थात् बुद्धि की अत्यन्त आवश्यकता रहती है । पर यथार्थ में कविता का उद्देश्य निरे ज्ञानपूर्ण गम्भीर - तत्त्वों का निरूपण नहीं है । यह काम विद्या - बुद्धि का है । कविता ललित कला है । उसका मनुष्यों के अन्तःकरण के सौन्दर्य को विकसित करना और उनको मन्त्र - मुग्ध कर उनकी विचलित स्वाभाविक प्रवृत्तियों को प्रकृत - पथ पर लाना ही है । प्रतिभा , अभ्यास और अध्यवसाय को छोड़ कर कविता करने के लिए निरीक्षण और परिशीलन की भी अत्यन्त आवश्यकता है । सृष्टि में जितने पदार्थ हैं प्रकृति में जितने परिवर्तन होते हैं , मनुष्य - स्वभाव के जितने विकार हैं , कवि को निरीक्षण और परिशीलन द्वारा उन सब बातों का पूर्ण ज्ञान सम्पादन करना चाहिए । जिस कवि में प्रकृति पर्यालोचना की शक्ति नहीं है जिसको मानव - स्वभाव का ज्ञान नहीं है वह कदापि अच्छी कविता नहीं कर सकता । इसके लिए ग्रन्थ अध्ययन की अधिक आवश्यकता नहीं है । हम निरीक्षण और अनुभव द्वारा इन बातों को अच्छी तरह जान सकते हैं । ग्रन्थों में भी उन्हीं बातों का वर्णन है , पर प्रतिबिम्ब की अपेक्षा मूल वस्तुओं का ही निरीक्षण अधिक लाभदायी है । हिन्दी साहित्य में मध्यवर्ती युग में ' नायिका - भेद ' ने बहुत जोर पकड़ा । हमें देखना चाहिए कि ' नायिका - भेद है क्या वस्तु ? और कुछ नहीं वह अवस्था भेद और प्रकृति भेद के अनुसार स्त्रियों के स्वभाव और आचरण में जो अन्तर होता है उसका वर्णन मात्र है । पूर्ववर्ती कवियों ने निरीक्षण और अनुभव द्वारा इस विषय का इतना वर्णन किया कि उसके कई ग्रन्थ बन गये और वह काव्य - शास्त्र का एक अंग मान लिया गया । जिसमें निरीक्षण शक्ति अधिक है वह इसका अनुभव स्वयं प्राप्त कर सकता है । भारतवर्ष को छोड़ कर मैं समझता हूँ , अन्यत्र यह विषम शास्त्र - रूप में कहीं प्रतिपादित नहीं हुआ है । तो क्या विदेशी भाषाओं के कवि अपनी कविता में अपने ग्रन्थों में इस विषय का वर्णन नहीं करते ? क्या विदेशी - काव्य उपन्यास आदि ग्रन्थों में जिन नायिकाओं का वर्णन है , उनके गुण स्वभाव के लक्षण हमारे ' नायिका - भेद ' के शास्त्रों में कह गये लक्षणों से नहीं मिलते ? मानव - स्वभाव के मूल तत्त्वों में सर्वत्र समानता है । जो मानव - स्वभाव को समझता है , वह इन बातों को भी जरूर समझता है ।
प्रकृत - कवि में प्रकृति पर्यालोचना और मानव - स्वभाव - अनुशीलन की स्वाभाविक - शक्ति होती है । कुछ तो इसी शक्ति के कारण और कुछ अपनी स्वाभाविक जिज्ञासा के कारण वह तिनके से लेकर पर्वत तक , बूंद से लेकर सागर तक और जुगनू से लेकर सूर्य तक , प्रकृति के रहस्यों का ज्ञान थोड़े ही समय में प्राप्त कर लेता है । उसी प्रकार जीवन के सुख - दुःख , हर्ष - विषाद , संयोग - वियोग और तज्जनित भिन्न - भिन्न मनोविकारों का भी उसे पूरा अनुभव होता है । यदि ऐसा न होता तो वह अपनी कविता में उन मनोविकारों और भावों का चित्र ज्यों - का - त्यों कदापि नहीं उतार सकता । जब कवि को इन बातों के प्रत्यक्ष - अनुभव का अवसर हाथ नहीं लगता - तो वह निरीक्षण द्वारा उन्हें जानने का यत्न करता है । समझ लीजिए , उसे अपने जीवन में प्रिय - वियोग दुःख अनुभव करने का कभी मौका नहीं आया पर वह किसी अमर लोक में तो नहीं रहता । वह अपने को चारों ओर से प्रिय - वियोग की अग्नि से जलते हुए लोगों से घिरा हुआ पाता । इस अवस्था में वह किसी वियोग की आत्मा में प्रवेश - सा करके उसके वियोग - दुःख का ज्ञान प्राप्त कर लेता है । यह गुण सहृदय लोगों को छोड़ कर दूसरों में नहीं पाया जाता । कवि स्वभाव से ही सहृदय होता है । पर दुःखानुभूति में कवि से बढ़ कर और कोई नहीं । यही कारण है कि वह अकेले अपने मार्ग पर जाते हुए किसी सर्प के मुख में पड़े हुए मरणासन्न मेंढक के करुण - स्वर को सुनकर अथवा किसी बहेलिये के जाल - पाश में फँसे हुए निर्दोष - पक्षी के कातर - नेत्रों को देखकर अपने हृदयानुभूत दुःख और शोक के गुरुतर शब्दों को बिना मुख से बाहर निकाले रह ही नहीं सकता । यही कारण है कि प्रकृत - कवि का जीवन ' चिर हाहामय ' होता है । न उसमें परदुःखानुभूति होती , न उसका जीवन इतना दुःख और अशान्तिमय होता जिस बात को साधारण लोग भूल जाते हैं , वही कवि के हृदय में सदैव जागरूक रहती है । बेचारा कवि क्यों न हमारी दया का पात्र हो ।
कभी - कभी ऐसे कवियों की प्रतिभा का पूरा विकास बिना प्रत्यक्ष दुःखानुभव किये नहीं होता । हम कह आये हैं कि प्रतिभा का विकास घटना पर अवलम्बित है । कभी - कभी दुर्घटनाओं में भी कुछ हित छिपा हुआ रहता है । बड़े - बड़े कवियों के जीवन की घटनाओं को यदि विचार किया जाय , तो मालूम होता है कि उनमें से अधिकांश को दिगन्त - व्यापिनी कीर्ति का कारण ऐसी कोई खास दुर्घटना ही है जिससे कि विषमय फलों का अनुभव कर उनके हृदय के सुषुप्त भावों को जागृति और प्रतिभा का सहसा स्फुरण हो गया । यदि उनके जीवन में ऐसी दुर्घटना नहीं होती , तो शायद उनकी प्रतिभा का फल संसार को प्राप्त ही नहीं होता और वह बिना विकसित हुए ही गुप्त भाव से उनके साथ नष्ट हो जाती ।
प्रतिभावानों में अकर्मण्यता , आलस्य , अस्थिरता आदि दुर्गुण पाये जाते हैं । ये
दुर्गुण ही उनकी प्रतिभा को विकसित होने नहीं देते । पर एक घटना विशेष के प्रभाव से जब उनकी मोह निद्रा टूट जाती है , तब प्रतिभा एकाएक स्फुरित हो उठती है । इस स्थल पर स्मरण रखना चाहिए कि प्रतिभा का विकास दुर्घटनाओं ही पर नहीं , शिक्षा और सत्संगति पर भी बहुत कुछ अवलम्बित है । देहाती बस्तियों में कहीं - कहीं ऐसे लोग पाये जाते हैं जो साधारण वार्तालाप में भी औरों से बड़ी विशेषता रखते हैं । उनकी उक्तियाँ हृदय में चुभ जाती हैं और उनके नवीनता और मौलिकता पूर्ण कथन अन्तःकरण में घर कर लेते हैं । ऐसे ग्रामीणों में कुछ कम प्रतिभा नहीं होती । पर शिक्षा और सत्संगति के अभाव से उनकी प्रतिभा को पूरा - पूरा विकास का संयोग नहीं मिलता । यदि वे शिक्षित होते तो शायद सुगमता से अच्छी कविता भी कर लेते ।
कविता करने में जिन - जिन बातों की अत्यन्त आवश्यकता होती है उनका वर्णन हो चुका । अब हम आगे यह देखने का यत्न करेंगे कि कविता कैसी होनी चाहिए उसमें किन - किन बातों की प्रधानता होनी चाहिए और विकास का स्वाभाविक क्रम क्या है ?
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कविता का उद्देश्य है लोकोत्तर आनन्द प्रदान करना । इस आनन्द का स्थान आहार - विहार जनित पाशविक आनन्दों से बहुत ऊँचा है ; इसी से वह लोकोत्तर कहा जाता है । कविता के पाठ से पाठक को लाभ हो या न हो , पर उसकी उक्तियों के चमत्कार से उसे चमत्कृत जरूर हो जाना चाहिए । विचार कर देखा जाय , तो ज्ञात होगा कि कविता अपने इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायता प्रदान करने के लिए ही भाषा और भाव - प्रकाशन में गद्य की अपेक्षा कई विशेषताएँ रखती हैं । यदि वह पाठकों को लाभ ही पहुँचाना चाहती , तो क्यों न साधारण लेख की तरह लाभ की बातें कह सुनाती । काव्य कला का सौन्दर्य - प्रदर्शन ही कविता का मुख्य व्यापार है , उपदेश का विषय गौण है ।
पर इस सम्बन्ध में एक बात स्मरण रखने योग्य है कि समय भेद से कभी - कभी कवियों को कविता के मुख्य उद्देश्य की उपेक्षा करके उसके गौण व्यापार को ही प्रधानता प्रदान करनी पड़ती है । जिस देश के कवि इस बात का ध्यान नहीं रखते उस देश को महान विपत्ति में फँसना पड़ता है । किसी जाति अथवा समाज का उत्कर्ष या अपकर्ष कई अंशों में उसके कवियों की लेखनी पर ही अवलम्बित रहता है अपने इस दायित्व को समझकर जो कवि लेखनी का परिचालन करता है उसकी रचना विशेष मूल्यवान होती है । देव और बिहारी की अपेक्षा गुसाईं जी ने इस तत्त्व को अधिक समझा था । समाज की अवस्था देखकर साहित्य बनाना पड़ता है । जिस समय कोई जाति अथवा समाज मोहान्ध होकर अवनति के गढ्ढे में गिरने जा रहा हो , उस समय उस जाति अथवा समाज का कवि कविता में निरे मनोरंजन ही को प्रधानता देकर चैन की वंशी भला कैसे बजा सकता है ? ऐसे अवसरों पर वह उपदेश दान के आगे मनोरंजन की अवहेलना करता है । इस आचरण से वह कविता का आदर्श - भंग नहीं बल्कि अपने समाज अथवा देश को उस आदर्श के सुख को उपभोग करने योग्य बनाने का यत्न करता है ।
कवि ईश्वरीय दूत है । उसका कार्य एक क्षुद्र सीमा से घिरा नहीं रह सकता । घर का सुधार करके वह अज्ञानता - पूर्ण संसार की ओर फिरता है । हमारे विचार में तो कविता का मुख्य गुण हितैषिता ही है । जिसके पाठ से मानव - जाति का कल्याण हो , जिससे संसार का हित साधन हो , वही कविता संसार की स्थायी सम्पत्ति कही जा सकती है । पर इन हित के बचनों को साधारण रीति से कहने से कविता का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता । उनके प्रकाशन में कुछ ऐसी विशेषता रहनी चाहिए कि उन्हें सुनकर सोता हुआ आदमी भी चौंक पड़े । कविता में जो बातें कही जायँ वे पवित्रता पूर्ण हों । कवि को अपने अन्तिम प्रयाण के समय इस बात का पूर्ण सन्तोष होना चाहिए कि मैंने कलुषित - विचार व्यक्त कर संसार का जरा भी अहित नहीं किया । कविता में जिस बात की शिक्षा दी गयी हो वह बिलकुल सत्य और शाश्वत हो । उसमें सौन्दर्य कूट - कूट कर भरा हो , चाहे वह सौन्दर्य भाव - सौन्दर्य हो , या नीति - सौन्दर्य या प्रकृति - सौन्दर्य ही क्यों न हो । संसार में जहाँ तक सौन्दर्य है वह बिलकुल सत्य है । अतएव कविता में सौन्दर्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए । यहाँ सौन्दर्य से हमारा मतलब उस सौन्दर्य से है जो अविनश्वर है जो नेत्रानन्ददायक ही नहीं , किन्तु हृदयानन्द विधायक भी है । आजकल हमारे अधिकांश कवि ' नख - सिख - वर्णन ' को ही सौन्दर्य - वर्णन की पराकाष्ठा समझते हैं । पर , यह उनका भ्रम है । उनका यह विचार प्रकृत भारतीय - विचार तो नहीं कहा जा सकता । अशाश्वत वस्तुओं के प्रति घृणा प्रदर्शन ही भारतीय - विचार की विशेषता है । भारत का मुख्य लक्ष्य नश्वर शरीर - सौन्दर्य नहीं , प्रत्युत अविनश्वर आत्मा का सौन्दर्य है । शरीर सौन्दर्य अर्थात् रूप की उपेक्षा कवि लोग इसीलिए नहीं कर सकते कि उसमें एक अविनश्वर ईश्वरीय - सत्ता होती है , जो उनके चित्त को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है । वे रूप का उपभोग करते हुए अपने हृदय में उसी ईश्वरीय - सत्ता का अनुभव करते हैं जिससे उनके चर्म - चक्षुओं ही की नहीं किन्तु आत्मा भी तृप्ति होती है । स्मरण रखना चाहिए कि कवि वह सौन्दर्योपासक है जिसकी उपासना में वासना की गन्ध नहीं होती ।
उक्त ईश्वरीय - सत्ता ही ' रूप ' के आदर का कारण यथार्थ में दया , ममता , प्रेम , सहानुभूति , अहिंसा आदि के सम्पूर्ण सद्गुणों का विकास ही मानव जीवन का प्रकृत - सौन्दर्य है । अतएव कविता में इन्हीं स्वर्गीय - भावों का वर्णन होना चाहिए । जिस कविता को पढ़कर हृदय की संकीर्णता दूर नहीं होती , जिसके स्वभाव से मनुष्य व्यक्तित्व को भूलकर विश्व प्रेम के रस में डूब नहीं जाता , जिसके आकर्षण से पढ़ने वाले का मन उच्चता और महानता की ओर बरबस खिंच नहीं जाता , उसे कविता के मुख्य गुण से हीन समझना चाहिए । कविता के पढ़ते ही मनुष्य के हदय में कर्तव्य - परायणता और आत्म - सम्मान आदि का भाव जागृत हो जाना चाहिए । इन्हीं बातों पर मानव - जीवन का सौन्दर्य अवलम्बित है । हम कह आये हैं कि कविता ललित कला का एक अंग है अतएव शिल्प , संगीत चित्रकारी आदि के समान कविता का भी मुख्य आधार सौन्दर्य ही है । सौन्दर्य - वर्णन के सिवा कविता में कुछ ऐसी विशेषता चाहिए कि उसके पाठ से सर्वत्र ईश्वरीय भाव अथवा एक अदृश्य शक्ति या किसी अखण्ड नियम की व्यापकता और प्रधानता परिलक्षित हो । कविता में सरलता अथवा एक प्रकार के भोलेपन की भी अत्यन्त आवश्यकता होती है । प्राचीन काल की कविता में यह गुण स्वभावतः विशेष पाया जाता था । तब न तो संसार में छल - कपट की अधिकता थी और न ईर्ष्या , द्वेष और पाखंड का प्राबल्य था । सर्वत्र सरलता का साम्राज्य था । तब सृष्टि स्वयं कवितामयी थी । पर अब वह हाल नहीं रहा । सभ्यता ने आज घोर परिवर्तन उपस्थित कर दिया है । संसार आज अपने चातुर्य और बुद्धिबल का परिचय देता हुआ सरलता का गला घोंट रहा है । इस अवस्था में यदि कविता अपनी बहन सरलता को आश्रय न देगी तो संसार में उसका अस्तित्व ही उठ जायेगा । दूसरी आवश्यक वस्तु है संक्षिप्तता । कविता की विशेषता है थोड़े में अधिक भाव व्यक्त करना अतएव कवि को अपना मतलब बजनदार शब्दों में ही प्रकट करना चाहिए । कुछ लोग किसी विशेष बात को बतलाने के लिए पद्य के पीछे पद्य लिखते चले जाते हैं , ये उनकी रमणीयता और सार्थकता पर ध्यान नहीं देते । ऐसे लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि विशेषता - हीन एक पृष्ठ लिखने की अपेक्षा विशेषता - युक्त एक पंक्ति लिखना अच्छा है । कविता का आदर अथवा अनादर उसके विस्तार पर नहीं , बल्कि उसके अर्थ के चमत्कार पर अवलम्बित है । पर संक्षिप्तता ऐसी न हो जिससे कि कविता के अर्थ की स्पष्टता में बाधा पहुँचे । जहाँ तक हो सके , अर्थ को स्पष्ट ही रखना चाहिए , जिससे उसे समझने के लिए बुद्धि पर अधिक दबाव डालना न पड़े । कविता के भाव ऐसे गड्डम गोल न हों कि पढ़ने वाले को कवि का मुख्य उद्देश्य क्या है , इस बात के संशय में पड़ना पड़े । कविता में जो कुछ कहना हो उसे पेंचीदे तौर से न कहकर बिलकुल सीधी तौर से कहना चाहिए , जिससे पाठक के चित्त पर पढ़ते ही उसका भाव बैठ जाय । कविता में मौलिकता और नवीनता का भी ध्यान रखना चाहिए । पूर्ववर्ती कवियों के भाव चुराकर उन्हें नया रूप देने में बहुत से कवि बड़े कुशल होते हैं । यद्यपि इस बात से भी उनकी चतुरता व्यक्त होती है , तथापि दूसरों से ग्रहण किये हुए भाव मूलभावों की समानता कभी नहीं कर सकते । कविता को उत्तम बनाने के लिए जहाँ तक बने उसमें मूल - भाव ही लाने का यत्न करना चाहिए । अन्य सब गुणों से युक्त होकर भी मौलिकता - हीन कविता पूर्ण आदर प्राप्त नहीं कर सकती । उसी तरह कवि को प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए अपनी रचना में कुछ न कुछ नवीनता भी जरूर रखनी चाहिए । भाव में ही नहीं , विषय और शैली में भी नवीनता चाहिए । हर समय अनुकरण अच्छा नहीं लगता । मनुष्य का जी नयी - नयी चीजें देखने को बहुत होता है । पुरानी वस्तुओं से नित्य के प्रयोग के कारण प्रायः अरुचि हो जाया करती है । यदि कवि अपनी कविता में कुछ न कुछ नवीनता रखेगा , तो लोग उसे बहुत चाव से पढ़ेंगे ।
कविता का एक और प्रधान गुण है स्वाभाविकता । कवि जिस अवस्था का वर्णन करे उसके विचार उस अवस्था के बिलकुल अनुकूल हों । यदि कोई मूर्ख , और बेसमझ आदमी वेदान्त के गूढ़ तत्त्वों का निरूपण कर बैठे , तो लोगों को वह जरूर खटकेगा । यदि हम किसी की दैन्य अवस्था का वर्णन करते हुए हास्य या व्यंग्य पर आ उतरें , तो वह सुनने वालों को इतना बुरा मालूम नहीं होगा । मतलब यह कि कविता में किस समय क्या कथन किया जाय और किसके मुख से क्या बात कहलाई जाय इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए ।
कविता के अनेक भेद हैं , उन पर एक स्वतन्त्र लेख लिखा जा सकता है । हम यहाँ इतना ही कहना चाहते हैं कि उपदेश गर्भक कविता में यदि कवि निरे उपदेशक की नाई नैतिक वक्तृता न देकर अपना उद्देश्य प्राकृतिक घटना अथवा प्राकृतिक वस्तु की स्वाभाविकता की नींव पर खड़ा करे तो उसका प्रभाव पाठकों पर अधिक पड़ सकता है । प्राकृतिक वस्तुओं , प्राकृतिक नियमों से बढ़कर सत्य और प्रामाणिक दुनिया में और क्या हो सकता है । वे ईश्वरीय नियम हैं - सर्वव्यापी हैं । कवि नश्वर है । अतएव वे सब लोगों को सब काल के लिए मान्य हो सकते हैं । पर , ऐसी कविताओं के उद्देश्य को उनके अंत में सारांश रूप में व्यक्त नहीं कर देना चाहिए । प्राकृतिक घटना का ज्यों - का - त्यों वर्णन कर इच्छित उपदेश को ढूंढ़ निकालने का भार पाठक पर ही छोड़ देना चाहिए । पाठक जब कवि के इच्छित उपदेश को घटना वर्णन के पाठ से स्वयं ढूँढ़ निकालेगा , तो वह उपदेश उसके चित्त में स्थायी अधिकार कर लेगा । इससे उसकी बुद्धि को भी फैलने का अवसर मिलेगा ।
खेद की बात है कि हमारे अधिकांश पाठक पुरानी लकीर ही के फ़कीर है । वे ऐसी कविता को जिसके भाव समझने के लिए उन्हें जरा भी मेहनत पड़ती हो पढ़ना पसन्द नहीं करते । इसका कारण शिक्षा का अभाव है । बहुत से पाठक यह कहते हैं कि हम उच्च भावों को ग्रहण करने के योग्य नहीं । पर हम में इस बात की योग्यता आप ही आप आ जाएगी । हमें प्रयत्न करके अपनी रुचि का संस्कार करना होगा । अंग्रेजी - साहित्य की बात ही छोड़िये , बँगला साहित्य को ही लीजिए । उसमें आपको अधिकतर उच्च - भाव पूर्ण कविता ही देखने में आएगी । यह बात नहीं कि हिन्दी में वैसी कविता नहीं लिखी जा सकती या आजकल हिन्दी में उस ढंग की कविता लिखने वाले कवि नहीं । ऐसी कविता के अभाव का कारण पाठकों की रुचि की प्रतिकूलता ही है । पर अब हिन्दी में भी भाव - मूलक कविताएँ निकलने लगी हैं । यदि पाठकों ने पसन्द किया तो थोड़े दिनों में यह अभाव बहुत कुछ दूर हो जावेगा ।
अब हम कविता के स्वाभाविक क्रम - विकास का संक्षिप्त वर्णन करते हैं । कविता का क्रम - विकास कवि के अवस्था - क्रम पर अवलम्बित है । कवि जब सर्वप्रथम कविता करने बैठता है , जब सांसारिक और प्राकृतिक वस्तुओं का वर्णन करता है । उनके वर्णन में पहिले तो कोई विशेषता नहीं होती , पर धीरे - धीरे वह इसमें इतनी उन्नति करता है कि प्राकृतिक वस्तुओं का आश्रय लेकर कविता में उच्च से उच्च उपदेश निहित कर सकता है । यह कविता की प्राथमिक स्थिति है ।
दूसरी स्थिति वह है जब कवि सांसारिक वस्तुओं का वर्णन न कर सांसारिक भावों का वर्णन करता है , यह गुण अवस्था और अनुभव वृद्धि से प्राप्त होता है । उन्हें यदि सुख दुःख , योग - वियोग , मधुरता और कटुता - पूर्ण संसारी जीवन की आलोचना कहें तो असंगत न होगा । सर्व साधारण में ऐसी कविता का इतना प्रचार होता है । उसके पाठ से उन्हें हर्ष होता और विपत्ति में धैर्य मिलता है ।
कविता जब अपनी तीसरी स्थिति पर पहुँचती है , तब उसमें धार्मिक भाव और वेदान्त के तत्त्वों की अधिकता पायी जाती है । कविता की यही अन्तिम स्थिति है । मानव जीवन का प्रवाह जब धार्मिक भावों के समुद्र में जाकर लीन हो जाता है , तब वह अपने अन्तिम लक्ष्य पर पहुँच जाता है । मानव जीवन का जो उद्देश्य है , वही कविता का उद्देश्य है । इस स्थिति के कवियों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उनकी कविता नीरस न हो , दूसरी स्थिति की कविता का विषय स्वभाव से ही सरस होता है । पर वेदान्त एक कठिन विषय है । उसका रस बहुत भीतर घुसे बिना नहीं मिलता है ।
यदि कविता में कोरा वेदान्त ही छाँटा जायगा , यदि विषय की रुक्षता बनी रहेगी , तो उसके पाठ से लोगों को क्या लाभ होगा । वे वेदान्त के ग्रन्थों का ही अध्ययन क्यों न कर लेंगे । इस विषय की कविता ऐसी हृदयग्राहिणी और शान्ति - दायिनी होनी चाहिए कि उसका एक पद्य पढ़कर आदमी संसारी चिन्ताओं को एकदम भूल जाय ।
कविता में सफलता प्राप्त करने के लिए विषय - निर्वाचन पर अधिक ध्यान देना चाहिए । कवि का काम है सोती जनता को जगाना , अन्धकार पूर्ण विषयों पर प्रकाश डालना , मोहान्ध लोगों को उचित मार्ग पर लाना , उन्हें उनकी आवश्यकताएँ सुझा देना , इत्यादि । इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कविता का विषय चुनना चाहिए ।
जिस देश में विषय - वासना की अग्नि लोगों को जला रही हो , वहाँ के कवियों का कर्त्तव्य है उसे उपदेश - पद - कविता - रूपी - वारि सिंचन से बुझाना , न कि ' नायिका भेद ' और ' नख - शिख ' वर्णन रूपी घृत डालकर उसे और प्रज्वलित करना ।
समाज सुधार और देश - हित ये कार्यों में जो काम बड़े - बड़े वक्ताओं को लम्बी - लम्बी वक्तृता और नेताओं के हलचल से नहीं निकलता , वही काम कभी - कभी एक छोटी - सी कविता से आसानी से निकल सकता है । अतएव कविता के विषय चुनने में समय की आवश्यकता का विचार जरूर रखना चाहिए । इस विषय का उल्लेख हम इस लेख के प्रारम्भ में ही कर आये हैं । कविता करते हुए एक और बात जो ध्यान में रखने लायक है वह उसका सुर है । कविता को अधिक जोरदार बनाने के लिए अर्थ की मधुरता के साथ सुर की मधुरता भी आवश्यक होती है । सुरस्वर कविता के पाठ का हृदय पर बड़ा असर होता है । सुर की मधुरता के कारण सुशब्द विन्यास और छन्द है ।
(3)
भाषा
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आजकल हिन्दी में जितनी कविताएँ निकलती हैं , वे प्रायः ' खड़ी बोली ' की ही होती हैं । पर 15 , 20 वर्ष पहले यह हाल नहीं था । तब हिन्दी पद्य की भाषा ब्रजभाषा थी । हमारे कुछ दूरदर्शी श्रद्धेय गुरुजन खड़ी बोली में तब भी कुछ - कुछ लिखा करते थे । पर उनके विरोधियों की संख्या कम नहीं थी । ब्रज - भाषा के प्रेमी तब खड़ी बोली को कर्कश और कविता करने के अयोग्य सिद्ध करने में व्यस्त थे । उन्हें लोगों की रुचि का कुछ भी विचार नहीं था । पर समय ने हिन्दी - साहित्य में कुछ ऐसा परिवर्तन उपस्थित कर दिया कि आज खड़ी बोली ही का सर्वत्र बोलबाला है । जो कभी खड़ी - बोली की कविता के घोर विरोधी थे वे ही आज उसकी पीठ ठोंक रहे हैं । पर , आज भी खड़ी बोली का मार्ग बिलकुल कण्टक - शून्य नहीं कहा जा सकता ।
आज भी कुछ ब्रजभाषा भक्त ऐसे हैं जो ' खड़ी बोली ' को कर्ण कटु कह कर उसका प्रचार रोकने के प्रयासी हैं । यह उनके ब्रज - भाषा प्रेम का परिचायक है । इससे खड़ी बोली का प्रचार रुकने वाला नहीं । यह कौन नहीं जानता है कि ब्रजभाषा अत्यन्त मधुर है ? पर क्या यह मधुरता - गुण उसे चिरस्थायी बनाने में समर्थ हो सकता है ? संसार में कोई भाषा अपरिवर्तित रूप से नहीं रह.सकी है । समय के प्रवाह और लोगों की रुचि ने ऐसे - ऐसे परिवर्तन उपस्थित किये हैं जो भाषाएँ कभी सर्वमान्य और सर्व - गुण - सम्पन्न समझी जाती थीं वे ही आज मृत भाषाएँ कही जा रही हैं । और उनके स्थान में अन्यान्य भाषाएँ काम में लायी जा रही हैं । मतलब यह कि कोई भाषा अपनी मधुरता और अन्यान्य गुणों के कारण चिरस्थायी नहीं हो सकती । यह तो सभी मानते हैं कि उच्चारण की सुविधा के लिए संस्कृत के कठिन और कर्कश शब्दों को सरल और कोमल बनाकर प्राकृत भाषा निर्मित की गयी । प्राकृत भाषा ऐसी मधुर थी कि उसके प्रेमी उसे अपरिवर्तनीय समझते थे ; पर क्या कारण है कि प्राकृत ऐसी मधुर और कोमल भाषा को हिन्दी के लिए अपना स्थान छोड़ना पड़ा ? खड़ी बोली आज ब्रज - भाषा का स्थान छीन रही है । सम्भव है , कल उसे भी किसी अज्ञात भाषा के आगे अपना सिर झुकाना । भाषा का परिवर्तन सर्वथैव लोगों की रुचि और समय की गति पर निर्भर है । ऐसी दशा में खड़ी बोली का प्रचार रोकने के अभिप्राय से उसके विरुद्ध विरोधी - दल का कुछ कहना - उसे ' कर्कश ' , ' कर्णकटु ' कविता के अयोग्य बनाकर , उसकी निन्दा करना केवल जीभ की खुजली मिटाना है ।
(सार्वमान्य और गुण सम्पन्न तो वे अब भी समझी
से मृत -भाषाएं कहलाती हैं। मृत भाषा कहने से उसका मान नहीं घटता। --सम्पादक)
जो लोग ' खड़ी बोली ' में कविता करते हैं उनका अभिप्राय लोगों की रुचि का अनुसरण करना है , न कि ब्रज - भाषा को कर्ण - कटु और गुण - हीन सिद्ध करना । ब्रज - भाषा की मधुरता का प्रमाण इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि फारसी जैसी मधुर भाषा के सुकवि ' अलीहजी भी ब्रज में जाकर मातृ - भाषा की मधुरता को भूल गये और रहीम , रसखान आदि अनेक विधर्मी कवि भी उसकी ओर झुक पड़े । खड़ी बोली के समर्थकों में ऐसा कृतघ्न तो कोई होगा जो ब्रज - भाषा के महत्त्व को स्वीकार न करता हो ? जिस भाषा को तुलसी , सूर , केशव और बिहारी ने अपनाया , उसके महत्त्व का क्या कहना ? जब तक हिन्दी भाषा का अस्तित्व है तब तक ब्रज भाषा का भी महत्त्व समझना चाहिए । पर उसका यह महत्त्व ' खड़ी बोली ' के प्रचार को रोक नहीं सकता । संसार में शायद ही कोई ऐसा साहित्य होगा , जिसमें गद्य और पद्य के लिए जुदी - जुदी भाषाएँ काम में लायी जाती हों । जब तक हिन्दी के गद्य का कोई रूप निर्धारित नहीं हुआ था , तब तक तो लोग ब्रज भाषा में कविता करने में कोई हानि नहीं देखते थे , पर भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने जब से हिन्दी गद्य को उसका आधुनिक रूप दिया , यथार्थ में तभी से लोगों के हृदय में खड़ी बोली अर्थात् प्रचलित गद्य को पद्य की भी भाषा बनाने के भाव प्रकट होने लगे । उनके ये भाव प्राकृतिक नियम के अनुकूल थे अतएव पद्य की भाषा के रूप में ' खड़ी बोली ' के प्रचार में अधिक समय नहीं लगा । अब तो ' खड़ी बोली ' एक प्रकार से पद्य की भाषा निर्धारित ही हो गयी । आधुनिक पत्र - पत्रिकाओं में ' ब्रज भाषा ' के पद्यों का प्रकाशन एकदम बन्द हो जाना ही प्रमाण है ।
पर इस समय ‘ खड़ी बोली ' के कवियों के भी दो दल हो रहे हैं । एक दल गद्य और पद्य की भाषा को बिलकुल एक करना चाहता है । दूसरा दल पद्य को कुछ स्वतन्त्रता देने का पक्षपाती है । पहिला दल शब्दों को उसी रूप में रखना चाहता है जिस रूप में कि वे गद्य में प्रयुक्त होते हैं , पर दूसरा दल आवश्यकतानुसार उनको कुछ अल्प - परिवर्तन के साथ ग्रहण करने में भी कोई हानि नहीं समझता ' । पहिला विवशता के समय भी इसका - उसका आदि को इस्का - उस्का लिखने का घोर विरोधी है, पर दूसरा उच्चारण के ध्यान से कुछ वर्षों के हलन्त के प्रयोग का पक्षपाती है । ऐसे कई मतभेद हैं । इस मतभेद से खड़ी बोली को लाभ ही होगा , हानि नहीं । ऐसी अवस्था में जब कि एक बहुकाल - व्यापी भाषा को स्थान - च्युत करके हिन्दी - साहित्य में खड़ी बोली अपना आधिपत्य स्थापित कर रही है , मतभेद का होना स्वाभाविक ही है । हम इसे ' खड़ी बोली ' की उन्नति का लक्षण समझते हैं ।
(1. अलीहजी ब्रज की एक गँवार बालिका के मुख से सुनकर मुग्ध हो गये थे - सम्पादक " साकरी पगन बीच काँकरी गड़त है । " - सम्पादक 2. सभी साहित्यों में गद्य और पद्य की भाषा में थोड़ा बहुत भेद अवश्य होता है , पर इतना नहीं , जितना हिन्दी में है ।)
उक्त दोनों दलों में से किसके सिद्धान्त मान्य हैं ? यद्यपि हमें यह विश्वास है कि आगे चलकर दूसरे दल की जीत होगी , तथापि इस समय हम प्रथम दल वालों ही के मतों का समर्थन करेंगे । पाठक इस बात पर आश्चर्य करेंगे । यथार्थ बात तो यह है कि इस समय यदि दूसरे दल के मतों की पुष्टि की जायगी , तो खड़ी बोली के नव - कवि कविता करते हुए धीरे - धीरे ऐसे स्वतन्त्र हो जाएँगे कि बहुत शीघ्र ही पद्य और गद्य की भाषा में बड़ी विभिन्नता हो जाएगी । बिना किसी भय या रुकावट के ही लोग शब्दों को तोड़ - मरोड़ कर पद्य में भरने लगेंगे , क्रिया प्रयोगों में भी स्वतन्त्रता से काम लिया जाने लगेगा । फिर ' ब्रज भाषा ' को अलग करने से लाभ ही क्या होगा ? प्रायः सभी भाषाओं में गद्य की भाषा से पद्य की भाषा में कुछ न कुछ अन्तर होता ही है । पर स्मरण रखना चाहिए कि यह अन्तर एक या दो दिन में नहीं हो जाता । शब्द और क्रिया आदि के सम्बन्ध में व्याकरण के निर्धारित नियमों का जान बूझ - कर उल्लंघन करना यथार्थ में कविता के नाम से व्याकरण की हत्या करना है ।
कवि लोग रचना क्रम से कभी - कभी जो भूल कर जाते हैं वह परवर्ती काल में कविता के ग्राह्य मान ली जाती है । इस प्रकार कुछ समय में पद्य की भाषा गद्य की भाषा से कुछ दूर जा पड़ती है । जो लोग पद्य और गद्य की भाषा को एक ही रूप में देखना चाहते हैं उनको स्मरण रखना चाहिए कि ऐसा कभी नहीं हो सकता । इसके कई कारण हो सकते हैं।
प्रथम तो कविता में भाव की प्रधानता रहती है जिससे उसकी भाषा स्वभावतः ही सालंकार होती है । गद्य में ( गद्य से मतलब बोलचाल और साधारण लिखने - पढ़ने की भाषा से है - गद्य काव्य से नहीं ) यह बात नहीं पायी जाती । उसमें उन्हीं बातों का वर्णन रहता है जिन्हें हम प्रत्यक्ष देखते - सुनते हैं । कवि का हृदय स्वभाव से ही भाव ग्राही होता है । साधारण मनुष्य और कवि में इतना ही अन्तर है कि किसी घटना विशेष के दर्शन अथवा श्रवण से कवि का हृदय सहानुभूति के भावों से भर उठता है , पर साधारण मनुष्य अन्य पुरुष की तरह उसे देखने अथवा सुनने मात्र से अपना प्रयोजन रखता है , अब इन दोनों मनुष्यों को आप उनके दर्शन अथवा श्रवण करने के अनुभव को शब्दों के रूप में व्यक्त करने दीजिए । फिर देखिए कि दोनों की भाषा में क्या अन्तर है । आप देखेंगे कि साधारण मनुष्य के लेख की भाषा में बोल - चाल की भाषा से कोई विशेषता नहीं । उसके रूप में परिवर्तन बिलकुल नहीं हुआ ? पर कवि के लेख की भाषा सालंकार है , अतएव उसका रूप बोलचाल की भाषा के रूप से भिन्न है । इसका कारण यही है कि घटना के दर्शन अथवा श्रवण करने के समय साधारण मनुष्य के हृदय में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था । पर , उन्हीं बातों से कवि के हृदय - यन्त्र में ऐसा आघात पहुँचता है कि उसके एक - एक तार हिल उठते हैं । जब उसकी अवस्था में इतना परिवर्तन होता है तो कहिए उसकी भाषा के रूप में परिवर्तन कैसे न हो ? भावाधिक्य से कविता की भाषा सालंकार हो ही जाती है । कवि की बात जाने दीजिए । आप कभी निसांध्य रात्रि के समय किसी पुत्र - शोक - काल में जननी के करुण - क्रन्दन को सुनिए , फिर उसकी नरकालीन भाषा को उसके साधारण समय के बोलचाल की भाषा से मिलाइए।आप देखेंगे कि दोनों में कितना अन्तर है । इसका कारण उसके हृदय की विभिन्न अवस्थाएँ हैं । पुत्र - प्रेम के भावों से उसका हृदय जब बिलकुल भर गया , तब वे भाव क्रन्दन के रूप में बाहर निकलने लगे । भावाधिक्य और विक्षिप्तता के कारण उस समय उसकी भाषा सालंकार हो गयी , अतएव उसने बोलचाल की भाषा के रूप से एक भिन्न रूप धारण कर लिया ।
गद्य और पद्य की भाषा के रूपों में अन्तर होने का दूसरा कारण यह है कि कविता में सुर का ध्यान रखना पड़ता है , पर गद्य में नहीं । कविता को सुस्वर बनाने के लिए प्रायः कवि लोग उसमें यमक और अनुप्रास का प्रयोग करते हैं , जिससे पद्य की भाषा गद्य की अपेक्षा कुछ विलक्षण ही हो जाती है ।
तीसरे कारण का सम्बन्ध कवि की परतन्त्रता और स्वतन्त्रता से है । इसका उल्लेख ऊपर हो चुका है - तथापि इस विषय में हम यहाँ कुछ और लिखते हैं । उपर्युक्त कारणों से कविता की और बोल - चाल की भाषा के साधारण रूपों में अन्तर हो जाता है । पर यह ऐसा कारण है कि इससे गद्य और पद्य की भाषाओं में व्याकरण सम्बन्धी भिन्नता दृष्टिगोचर होने लगती है । यह तो सभी जानते हैं कि कवि की गतिमति छन्द के साथ बँधी हुई होती है । छन्द को नियत मात्राओं और वर्गों में ही उसे अपने भाव प्रकट करने पड़ते हैं । नियत मात्राओं और वर्णों का हो नहीं , लघु और गुरु का भी पूरा ध्यान रखना पड़ता है । बिना लघु - गुरु के विचार के नियमित मात्राओं अथवा वर्गों से ही छन्द नहीं बन सकता । भाव चाहे कैसे ही उच्च और नूतन क्यों न सूझे हों , पर यदि वे नियत मात्राओं में नहीं आ सकते , तो कौड़ी काम के नहीं । ऐसे सुन्दर भाव के इतनी उत्तम सूझ को कवि कैसे जाने दे सकता है । उसे नियत मात्राओं में अपना भाव व्यक्त करना ही चाहिए । यदि प्रयत्न करने पर छन्द के उपयुक्त शब्द मिल गये तब तो काम निकल गया , अन्यथा कविता में ऐसे शब्द , जो गद्य में काम में नहीं लाये जाते , रखने अथवा शब्दों को तोड़ - मरोड़ कर प्रयोग में लाने के सिवा और दूसरा चारा ही क्या है ? प्रायः कवियों की मात्राओं की संख्या कम करने के अभिप्राय से लम्बे - लम्बे सामासिक शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है । ऐसे अवसरों पर जो कठिनता उपस्थित होती है उसका अनुभव कवि के सिवा अन्य जन नहीं कर सकते । कभी एक शब्द के लिए उसे छन्द के ध्यान से घन्टों अटक जाना पड़ता है । एक शब्द की खोज में बेचारा कवि कभी - कभी इतना हैरान रहता है कि उसे भोजन स्वाद तक नहीं जान पड़ता और सारी रात नींद नहीं आती । हाय ! परतन्त्रता बड़ी बुरी चीज है । केवल क्षुद्र कवियों की ही नहीं महाकवियों की भी समय - समय पर वही दुर्दशा होती है । गद्य - लेखकों को इस कठिनता का सामना नहीं करना पड़ता । वे अपने विचार प्रकट करने में स्वतन्त्र होते हैं । उनकी लेखनी परतन्त्रता की बेड़ी से जकड़ी नहीं होती , वह इच्छानुसार दौड़ लगा सकती है । अतएव गद्य लेखकों के शब्दों को तोड़ - मरोड़ कर विकलांग बनाने और प्रचलित शब्दों को काम में लाने की आवश्यकता नहीं होती ।
इसके सिवा कवियों को कुछ स्वतन्त्रता भी रहती है । प्रतिभा के उन्मेष में कभी - कभी वे व्याकरण के प्रचलित नियमों का उल्लंघन कर जाते हैं । कभी बहु बचन के लिए एक बचन रख देते हैं , कभी क्रियाओं का विलक्षण ही रूप बनाते , तो संज्ञाओं से क्रिया बनाकर काम में लाते हैं । यदि बेचारा गद्य - लेखक ऐसा करे तो समालोचक - समूह उसे वाग्वाण - वर्षा से नाकों दम कर डाले । हमारे विचार में कवियों को इस ईश्वरदत्त स्वतन्त्रता को काम में लाते हुए बहुत सोच - समझकर चलना चाहिए । अनुकरण - प्रथा संसार में बहुत प्रचलित है । उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि हम आज भाषा के जिन साधारण नियमों की अवहेलना कर रहे हैं , हमारे उत्तराधिकारी कवि भी उनकी अवहेलना करने में कोई हानि नहीं समझेंगे ।
खड़ी बोली की कविता को अभी बालिका ही समझिए । पर , इस थोड़े समय के भीतर ही कवियों की उपर्युक्त परतन्त्रता ने उसके गद्य और पद्य की भाषा में बहुत कुछ अन्तर उपस्थित कर दिया है । तब खड़ी बोली के पद्य और गद्य को बिलकुल एक कर देने की इच्छा रखने वाले क्या यह नहीं सोचते कि कुछ और आगे चलकर खड़ी बोली की कविता का क्या रूप होगा ?
हम विस्तार - भय से यहाँ खड़ी बोली के गद्य और पद्य की विभिन्नता को उदाहरण देकर बतलाना नहीं चाहते । पाठक कुछ यत्न करने पर खड़ी बोली के सामयिक पद्यों में ही नहीं किन्तु खण्डकाव्य और महाकाव्य में भी इस विभिन्नता को सहज ही में देख सकेंगे ।
आजकल ' अपने जी में ' के लिए बहुत लोग पद्य में 'अपने हिये) लिखने लगे हैं । हमारे विचार में यह न तो कोई मुहाविरा है और न हिन्दी व्याकरण की दृष्टि से ही शुद्ध है । जान पड़ता है कि ' हिये ' शब्द में अधिकरण के चिह्न लगाने में संस्कृत व्याकरण की नियम की रक्षा की गयी है । गद्य में अपने हिये ' कहीं नहीं लिखा जाता । यदि इसके प्रयोग का क्रम जारी रहा , तो शायद आगे चलकर वह पद्य के लिए ग्राह्य भी हो जायेगा । इसीलिए हमने कवियों से अपनी स्वतन्त्रता को समझ - बूझकर काम में लाने की प्रार्थना की है । यह हमने एक बानगी दिखलायी है । आजकल खड़ी बोली की कविता में ऐसे और भी कई विचारणीय प्रयोग पाये जाते हैं ।
साधारण शब्दों से क्रिया - पद बनाने की रीति पहिले कहीं - कहीं बंगाली कविता में देखी जाती थी । माइकेल मधुसूदन दत्त ने अपने अन्त्यानुप्रास हीन अमर - काव्य ' मेघनाथ वध ' में इस रीति से कई जगह काम लिया है , समालोचकों ने इस पर आक्षेप भी किया था । हमें हिन्दी कविता में भी दो जगह ऐसे प्रयोग देखने को मिले हैं । कौन कह सकता है - आगे इस रीति का विशेष आदर होने लगे ।
अब हम कविता की भाषा सम्बन्धी कुछ और बातों का वर्णन कर इस विषय को समाप्त करेंगे ।
आजकल हिन्दी - गद्य में दो प्रकार की भाषा लिखी जाती है - एक संस्कृत शब्द - प्रधान , दूसरी बोलचाल की ।। संस्कृत - शब्द प्रधान - भाषा से हिन्दी के निजत्व में और बोलचाल की भाषा से उसके राष्ट्रीयत्व में बट्टा लगता है । पर लिखी जाती है- दोनों प्रकार की हिन्दी । जो घर में सदा हिन्दी ही बोलते हैं , वे तो दूसरे प्रकार की हिन्दी लिखना अधिक पसन्द करते हैं , किन्तु जो दूसरी बोलियाँ बोलते हैं उन्हें ऐसा करने में कठिनता होती है , अतएव वे संस्कृत शब्द - प्रधान भाषा लिखते हैं । फिर भी कुछ लोग रुचि भेद से ' टकसाली ' हिन्दी लिखा करते हैं और वे कुछ सज्जन भी जो घर में हिन्दी ही बोलते हैं - संस्कृत - शब्द - प्रधान हिन्दी को अधिक पसन्द करते हैं , अथवा दोनों ही प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते हैं ।
हमारी समझ में आजकल खड़ी बोली की कविता की भाषा का भी यही हाल है।
कविता के शब्द - भंडार का द्वार बोल - चाल में आने वाले सब शब्दों के लिए तो खुला ही रहना चाहिए , किन्तु आवश्यकतानुसार उसमें अप्रचलित संस्कृत शब्दों को भी प्रधानता देनी चाहिए । बिना ऐसा किये भाव - प्रकाशन में जरूर कठिनता होगी । हिन्दी का शब्द - समूह इतना विस्तृत नहीं है कि बिना कुछ अप्रचलित संस्कृत - शब्दों की सहायता के उसमें सुगमता से कविता लिखी जा सके । जिस भाषा में एक ही अर्थ के द्योतक जितने ही अधिक शब्द होते हैं उस भाषा के कवियों को कविता लिखने में उतनी ही सुगमता होती है । इस विचार से उर्दू के प्रचलित शब्दों को भी कविता में स्थान प्रदान करने की उदारता दिखलानी चाहिए । प्रचलित शब्दों को कविता में ग्रहण करते समय यह बिलकुल नहीं सोचना चाहिए कि वे किस भाषा के शब्द हैं । कवि - कुल - चूड़ामणि गुसाईं तुलसीदास जी आज के कोई सवा तीन सौ वर्ष पहले इस विषय में हमारे आदर्श हो गये हैं । खड़ी बोली के कुछ अत्यन्त प्रेमीगण कविता में ब्रज भाषा की कुछ प्रचलित क्रियाओं और शब्दों का प्रयोग भी अनुचित समझते हैं । हमारी समझ में यह अनुचित पक्षपात है , खड़ी बोली विदेशी शब्दों को भी ग्रहण कर सकती है , फिर ब्रजभाषा तो अपनी ही है । हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि खड़ी बोली और ब्रजभाषा की खिचड़ी पका दी जाय - जैसा कि आजकल के कुछ पद्य - लेखक करते हैं । जो ब्रजभाषा की क्रिया को काम में लाने की आवश्यकता आ पड़े तो ऐसा करने के पहले उसे खड़ी बोली की क्रिया का रूप अवश्य दे देना चाहिए ।
हमने पहले यह कहा है कि खड़ी - बोली की कविता में कुछ अप्रचलित संस्कृत शब्दों का प्रयोग अनुचित नहीं है । इससे यह नहीं समझना चाहिए कि हिन्दी - कविता के नाम से -
" प्रातर्ननामि तव पाद दयैकसिन्धो । "
के समान कोरी संस्कृत रचना की जाय अथवा
" सुरम्य रूपे , रस - राशि रंजिते !
विचित्रवर्णा भरणे ! कहाँ गयी " ?
के समान केवल क्रिया - भेद रखकर संस्कृत लिखा जाय , अथवा “ वसति त्वत्समगज नग क्रीड़ते दान - धार " के समान हिन्दी - कविता को एक विचित्र रूप दिया जाय ।
संस्कृत के हलन्त शब्दों को आजकल हिन्दी गद्य में बहुत से लोग शुद्ध रूप में लिखते हैं । यदि यह नियम मान लिया जायगा तो संस्कृत नहीं जानने वालों को इससे जरूर कठिनता होगी । हमारे विचार से इस नियम से कविता में भी उनका ठीक - ठीक प्रयोग नहीं हो सकेगा । अतएव हिन्दी में उन्हें सस्वर बना कर लिखना ही उत्तम होगा , अर्थात् ' विद्वान् ' , " भगवान् ' आदि शब्दों को विद्वान और भगवान लिखना चाहिए ।
अपभ्रंश शब्दों के विषय में इतना ही वक्तव्य है कि उनका आदर ब्रजभाषा में अधिक है । तथापि वे अपभ्रंश शब्द जो उनके शुद्ध शब्दों से भी अधिक प्रचलित हैं खड़ी बोली की कविता में काम में लाये जाते हैं । ' भक्ति ' और ' धनुष ' को ' भगति ' और ' धनुख ' खड़ी - बोली में नहीं लिख सकते , किन्तु ' अश्रु ' और ' धुरिका ' को ' आँसू ' और ' धुरी ' लिखने में कोई दोष नहीं । यह बात शब्दों के प्रचार और अप्रचार पर अवलम्बित रहनी चाहिए ।
कविता की भाषा ऐसी होनी चाहिए कि पढ़ते ही उसका अर्थ पाठकों की समझ में आ जाय । सरल भाषा से सर्वसाधारण को अधिक लाभ होता है। गुसाईं जी की कविता का स्वाद सभी चखते हैं , किन्तु बिहारी सतसई के दोहों को पूर्णतया समझने वालों की संख्या बहुत कम है ।
दूसरी बात यह है कि कविता में जिस रस अथवा विषय का वर्णन हो उसकी भाषा भी उसी रस अथवा विषय के अनुकूल होनी चाहिए । शब्द स्थापन और सुर के उतार - चढ़ाव में ऐसी विशेषता होनी चाहिए कि कविता को पढ़ते समय पाठक को विवश होकर वर्णित विषय अथवा रस के अनुकूल चेष्टा करनी पड़े । बंगला के मेघनाथ बध को पढ़ते समय कभी तो वीरता के उन्मेष से बाहें फड़कने लगती अनुसार हैं और कभी शोकाकुल होकर झर - झर आँसू बहाना पड़ता है । यह रस के भाषा के परिवर्तन का ही प्रभाव है । शब्द - स्थापन ऐसा विचित्र है कि पढ़ते - पढ़ते कभी सारंगी और मजीरा का सुर सुनायी पड़ता है तो कभी कानों में नगारों की गड़गड़ाहट गूंजने लगती है । कविता की भाषा में मुहाविरा का भी विशेष ख्याल रखना चाहिए । जिस कविता की भाषा मुहाविरा होती है उसे लोग रुचि से पढ़ते हैं और उसका प्रचार भी अधिक होता है ।
अगले अंक में हम छन्द पर कुछ विचार करके इस लेख को समाप्त करेंगे ।
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छन्द
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हम संक्षेप में कविता के शरीर और आत्मा का वर्णन कर चुके । अब उसके परिच्छेद का कुछ विवरण सुना कर इस विषय को समाप्त करेंगे । कविता करने के लिए सबसे प्रथम छन्दों का ज्ञान होना चाहिए । ' गद्य काव्य ' की बात हम नहीं कहते । पर जो पद्य में कविता करना चाहते हैं , वे बिना छन्द ज्ञान के एक पद भी आगे नहीं बढ़ सकते । जो लोग बिना छन्दों का ज्ञान प्राप्त किये ही पद्य लिखते हैं वे बुद्ध - समाज में ही नहीं , सर्व साधारण में भी अनादृत होते हैं । ऐसे लोगों की रचना में छन्दोंभंग का होना स्वाभाविक है । छन्दोभंग से उच्च से भी उच्च भाव - पूर्ण कविता का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है । बड़ी सुन्दर कविता है , बड़े सरस भाव हैं , बड़ा मधुर छन्द है ; पर जो बीच में छन्दोभंग के विपरीत पवन ने आकर पाठक के स्वर लहरी के स्वाभाविक प्रवाह को रोक दिया तो वहाँ ' मोहन भोग में कंकर ' के समान बहुत ही खटकता । जिस प्रकार सुमधुर झंकार के बीच सितार का तार टूट जाने पर सब रंग बेमजा हो जाता है , उसी प्रकार छन्दोभंग से भी कविता लूली हो कर अपना सौन्दर्य खो बैठती है । यही कारण है कि हमारे आचार्यों ने छन्दःशास्त्रों में छन्दोभंग को दोष माना है और उसे अनेक दुखों और विपत्तियों का कारण बतलाया है । इतने पर भी कुछ नवसिखुए यश प्राप्ति की त्वरा में छन्दोभंग पर ध्यान नहीं देते । यदि यह रुकावट नहीं होती , तो शायद आज छन्द पर और क्या - क्या नहीं बीतती । यथार्थ में “ अपि भाषं भषं कुर्यात् छन्दोभंग न कारयेत् ” कहने का मुख्य कारण यही है जो हमने ऊपर कहा है । " कविता कामिनि कान्त कालिदास का त्रयम्बकम् संयमिनम् ददर्श ' तो प्रसिद्ध है । ' त्रयम्बकम् ' का शुद्ध रूप ' त्र्यम्बकम् ' है । पर कवि - कुल गुरुजी यदि ' त्र्यम्बक् ' लिखते तो छन्दोभंग हो जाता , अतएव उन्होंने ऐसा करने की अपेक्षा व्याकरण पर ही अन्याय करना उचित समझा । इससे सिद्ध हुआ कि कवियों की निरंकुशता भी तब तक छन्दोभंग की उपेक्षा नहीं कर सकती जब तक कि वह बिलकुल निरुपाय नहीं हो जाती । छन्दोभंग से बचने के लिए छन्दों का ज्ञान होना चाहिए । यदि हमसे कोई छन्द की परिभाषा पूछे तो हम कहेंगे सुर के निर्दिष्ट उतार चढ़ाव और विश्राम के विचार से गिनी हुई मात्राओं अथवा वर्गों में जो विचार प्रकट किये जाते हैं , उन्हें छन्द कहते हैं । बहुत से लोग शुद्ध छन्द लिख सकने के अभिप्राय से छन्दों की निर्दिष्ट मात्राओं अथवा वर्गों की संख्या कण्ठस्थ किया करते हैं , जैसे हरिगीतिका छन्द में 28 मात्राएँ होती हैं , अमुक छन्द में इतनी मात्राएँ आदि । इसके अनुसार लिखे गये छन्द में यदि कोई छन्दोभंग बतलाता है तो वे बड़ा आश्चर्य करते हैं और मात्राएँ गिनकर अपनी . निर्दोषता बतलाने को तैयार हो जाते हैं । ऐसे लोगों को सुर के चढ़ाव - उतार के प्रधान कारण ह्रस्व और दीर्घ के यथास्थान प्रयोग का ज्ञान नहीं रहता । उन्हें चाहिए कि पहिले वे छन्द की गति अथवा लय का अभ्यास करें । जिन्हें इन बातों का अभ्यास है वे छन्दों की निर्दिष्ट मात्राओं की संख्या बिना जाने ही सुगमता से छन्दोभंग - रहित रचना कर सकते हैं । थोड़े दिन के पहले हिन्दी में ' तुकान्त ही में कवितान्त ' समझा जाता था । पर हर्ष की बात है कि अब कुछ लोग अतुकान्त कविता भी लिखने लगे हैं । हमारे कान तुकान्त पद्य सुनने के अभ्यस्त हो गये हैं अतएव जो अतुकान्त पद्य अभी हमें खटके तो कोई आश्चर्य नहीं ।
“ न जात खड़ी बोली पै कोउ भयो दिवानो ।
कोउ तुकान्त बिन पद्य लिखत में है उरझानो।।
यह झगड़ा बहुत पुराना है । नयी रीतियों का पहले विरोध किया जाना स्वाभाविक है । ब्रजभाषा ने खड़ी बोली से युद्ध किया , मात्रावृत्तों ने वर्ण - वृत्तों का मार्ग रोका और तुकान्त पद्य अतुकान्त के सामने आकर खड़ा हुआ । अपने पुश्त - दर - पुश्त के अधिकार को बिना एक मोरचा लड़े कोई कैसे छोड़ सकता है । बिलकुल छोड़ देने की बात दूर रही , अपने अधिकार का कुछ हिस्सा भी दूसरों में बँट जाना असहाय होता है । ‘ खड़ी बोली ' की तो विजय ही हो गयी । वर्ण वृत्तों को मात्रा - वृत्तों में बैठना ही अभीष्ट था , सो उसे भी अब प्रवेश मिल गया । पर तुकान्त - अतुकान्त के झगड़े का निबटारा अभी तक ठीक - ठीक नहीं हुआ है । हमारे विचार में तुकान्त के नियम का कविता में यदि पालन भी किया जाय तो कोई हानि नहीं । तुक मिलाने में समय - समय पर कवियों को बहुत दिक्कत उठानी पड़ती है और कभी - कभी तो इसके कारण अर्थ का सौन्दर्य भी नष्ट हो जाता । तुक के कारण और भी कई प्रकार के अनर्थ होते हैं । कोई विवशता बताकर शब्दों को तोड़ - मरोड़ पूर्व पंक्ति के अन्त्य शब्दों के साथ उनका सम्बन्ध जोड़ता है तो कोई रबर की तरह उन्हें खींच - खांच के लम्बा कर पूर्वान्त्य शब्दों से उनका ग्रन्थि - बन्धन करता है । अतुकान्त पद्य के विरोधियों का यह डींग मारना कि समर्थ कवियों के आगे शब्द - समूह मृत्यवत् हाथ बाँधे खड़े रहते हैं , ठीक नहीं जान पड़ता । हाँ , यह बात सत्य है कि शब्द भण्डार पर पूर्ण अधिकार रखने वाले कवियों को तुकों की रंकता नहीं सता सकती । इतना होने पर भी समय - समय पर बड़े से बड़े कवि को तुक के खयाल से अपनी लेखनी के वेग को मन्द करना पड़ता है । कवि कुल - शिरोमणि गुसाईं जी को “ बन्दौं गुरु पद - कञ्ज " के नीचे “ महामोह - तम - पुञ्ज " लिखने के पहले ' का ' और ' पुञ्ज ' के तुक पर विचार करते हुए जरूर कुछ देर अटकना पड़ा होगा । इसका कारण यह है कि प्रत्येक भाषा में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनके समान रूप वाले शब्द अधिक नहीं होते । जब ऐसे शब्दों की मैत्री स्थापित करने का मौका आ जाता है तब कवि को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है । समस्या - पूर्ति कर्ता हमारे ' रसिक समाजों ' में प्रायः तुकों की छीछालेदर हुआ करती है । ' केहि कारण नारि नवावत निब्बू ' की पूर्ति करने में तुकों की जो दुर्दशा हुई होगी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । ' घटिका शतक ' जैसे विद्वान अपनी जीवनी में , ' सूरज देखि सकै नहीं घुघ्यू ' की पूर्ति का उल्लेख भले ही सदर्प कर ले , पर हम तो उसे तुकों की हत्या ही कहेंगे ।
सारांश यह कि संकीर्ण स्थलों में तुकों के कारण अनेक अनर्थ होते हैं । अतएव अतुकान्त कविता करने में कवियों को बहुत कुछ सुभीता रहेगा । बंगला और उड़िया भाषा की कविता केवल अन्त्याक्षरों के मेल से भी बुरी नहीं जान पड़ती , पर हिन्दी में ऐसे तुक अच्छे जान नहीं पड़ते । उत्तम तुक वही है जिसमें शब्दों के सम्पूर्ण रूप में समत्व हो । इससे बंगला , उड़िया आदि भाषाओं की अपेक्षा हिन्दी में तुकान्त के कारण अधिक कठिनता होती है । अतुकान्त कविता के प्रचार से इस कठिनता से मुक्ति अवश्य मिल जायगी । जब तक तुकान्त की कैद से रिहाई पाकर हिन्दी कविता खूब स्वतन्त्र नहीं हो जायगी तब तक वह अपनी बहिनों के साथ दौड़ लगाने के योग्य नहीं हो सकेगी ।
“ अनुप्रास प्रतिबन्ध कठिन उर मांही ।
त्यागि पद्य प्रतिबंधह लिखत गद्य क्यों नाहीं ? "
इस पर हमारा इतना ही कहना है कि संस्कृति के विश्व - विश्रुत कवियों की समझ क्या इतनी प्रौढ़ नहीं थी कि वे इस गद्य और पद्य के भेद को समझते ? “ अनुप्रास कबहूँ न सुकवि की शक्ति घटावै । वरु सच पूछौ तो नव सूझ हिये उपजावै । " हम तो हजार प्रयत्न करने पर भी लेखक के इस कथन का मतलब नहीं समझ सकते । ऐसी बातों से अतुकान्त कविता का प्रचार रोकने की चेष्टा व्यर्थ है । हमारे विचार में स्वतन्त्र विचारों का सम्बन्ध शिक्षा की अपेक्षा समय की गति पर ही अधिक अवलम्बित है । उपर्युक्त कथन हमारे एक श्रद्धेय ' कला - कुमार ' ( बी.ए. ) के हैं । पर शायद आज के डेढ़ - दो युग पूर्व उनके जो खयाल थे , वे आज बदल गये हैं । आजकल के नवयुवकों का झुकाव अतुकान्त - कविता की ओर अधिक जान पड़ता है , यह बात नहीं । हमारे एक विद्या वयो - वृद्ध साहित्यरथी ने अतुकान्त कविता में ' महाकाव्य ' लिखकर हिन्दी - साहित्य में युगान्तर उपस्थित कर दिया है ।
अभी तक केवल वर्णवृत्त ही अतुकान्त कविता के उपयुक्त समझे गये हैं । पर स्वर्गीय व्यास जी के ' कंस वध ' काव्य के उल्लेख कर . यह कहना कि मात्रा वृत्तों में अतुकान्त कविता उत्तम बन ही नहीं सकती , उचित नहीं जान पड़ता । कौन कह सकता है कि भविष्य में कोई क्षमताशील कवि मात्रा - वृत्तों में ही अतुकान्त रचना में सफलता प्राप्त कर हमारे उक्त अनुमान को गलत साबित कर दे । शक्तिमान् लोग असम्भव को सम्भव कर दिखाते हैं । जिस समय बंगाल में अतुकान्त रचना के विचार को लोग पागलपन समझते थे , उस समय माइकेल मधुसूदन दत्त ने ' मेघनाथ बध ' का आविर्भाव कर पयार - प्लावित बंग - देश में अमित्रच्छन्द का प्रचार किया था । जो हो , जब तक मात्रा - वृत्ति अनुपयुक्त समझे जाते हैं तब तक वर्ण - वृत्तों में ही वृत्यानुप्रासहीन रचना करना चाहिए ।
यह तो हुई उस अन्त्यानुप्रासहीन रचना की बात जिसकी प्रत्येक पंक्ति विश्राम - चिह्न - युक्त होती है । अब हम विश्राम - चिन्ह - हीन पदयुक्त अतुकान्त - रचना पर विचार करते हैं । इसे दौड़ता हुआ अमित्रच्छन्द कहना ठीक होगा । केवल हिन्दी जानने वालों के लिए इस प्रकार का दौड़ता कूदता छन्द एक तमाशा है ।
पर जो अंग्रेजी या बंगला जानते हैं , वे ऐसी रचना से अच्छी तरह परिचित होंगे । यथार्थ में मात्रा - वृत्तों में अमित्राक्षर रचना करते हुए , इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए कि उनकी पंक्तियाँ विश्राम - चिन्ह - हीन हों । मात्रा - वृत्तों में सतुकान्त रचना सुनने के हम आदी हो गये हैं । यही कारण है कि अतुकान्त - मात्रा - वृत्त हमारे कानों को जरा खटकते हैं । इस खटक को दूर करने के लिए ऐसी रचनाओं में कुछ और नवीनता और विशेषता लानी चाहिए । हमारे ख्याल में उनके पद विश्राम - चिन्ह - हीन हुआ करेंगे तो लोग उन्हें चाव से पढ़ेंगे । पहले - पहल तो उन्हें ऐसी रचना के अर्थ समझने में कुछ कष्ट और विलम्ब होगा । क्योंकि उन्हें उसके वाक्यों का अन्वय करने के लिए एक ही पंक्ति पर नहीं बल्कि कई पंक्तियों पर दृष्टि दौड़ानी पड़ेगी । पर हमारा विश्वास है कि धीरे - धीरे अभ्यास से यह कठिनता दूर हो जायेगी ।
हिन्दी में इस प्रकार की विश्राम - चिन्ह - हीन पद - युक्त रचना बिल्कुल नयी बात है । आप प्राचीन अर्वाचीन समस्त कवियों की रचना को देख जाइए , आपको इस प्रकार के पद बहुत कम मिलेंगे । पर इस नवीनता के कारण ही इस प्रकार की रचना का विरोध करना कदापि उचित नहीं है । ऐसी रचनाओं में किसी नवीन प्रणाली से काम नहीं लिया जाता है । छन्द का रूप बदल जाता है , पर लेखन प्रणाली वही रहती है । जिस प्रकार साधारण रचना में विराम चिन्ह और यति का प्रयोग किया जाता है , उसी प्रकार उनका प्रयोग इसमें भी होता है । भेद है तो इतना ही कि साधारण रचना में छन्द भेद से पिंगल के अनुसार प्रत्येक पंक्ति की नियत मात्राओं में यति स्थापित करना ही पड़ता है , पर इस प्रकार की अतुकान्त - रचना में कवि नियत मात्राओं में ही नहीं बल्कि इच्छानुसार पंक्ति भर में चाहे जहाँ भी यति स्थापित करने को स्वतन्त्र रहता है।
हम इस बात को उदाहरण देकर स्पष्ट करते , पर स्थानाभाव के कारण ऐसा करने से विरत होते हैं ।
इस प्रकार की रचना अतुकान्त ही नहीं बल्कि तुकान्त - युक्त भी हुआ करती है । बंगाल के सुप्रसिद्ध कवि और नाट्यकार श्रीयुत द्विजेन्द्रलाल राय का ' सीता ' नामक काव्य इसी ढंग का है , जिसे पढ़ते समय पाठक शरीर की भी सुधि भूल जाता है । प्रतिभा युक्त कवि की बलवती लेखन जो न करे वह थोड़ा है । पर हिन्दी के लिए ये बातें अभी निरी कौतूहल वर्द्धक हैं । हिन्दी - साहित्य के प्रागंण में ऐसे नव्य - शक्ति - सम्पन्न सुकवियों की लेखनी का चमत्कार देखने के लिए हमें समय की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ।
विश्राम - चिह्न - रहित - पद संयुक्त भिन्न - तुकान्त रचना करना तुकान्त - युक्त रचना की अपेक्षा कठिन है । कोई - कोई तुकों का झगड़ा मिट जाने के कारण ऐसी रचना को सुगम समझते हैं , पर यह बात नहीं । ऐसी रचना को सुन्दर बनाकर सफलता प्राप्त करना साधारण कवियों का काम नहीं है । अन्त्यानुप्रास की मधुरता के न रहने के कारण उसे श्रुति - सुखद और हृदयग्राही बनाने के लिए कवि को सुशब्द - विन्यास और पद - लालित्य का अधिक ध्यान रखना पड़ता है । भाव के अनुसार भाषा को बदल देना और हृदय के आवेश अथवा गम्भीरता को सुर के चढ़ाव - उतार और वाक्यों के वेग अथवा शिथिलता द्वारा स्पष्टतया प्रकट करना इस प्रकार की रचना में अत्यन्त आवश्यक है । इसके लिए कौन - सा छन्द काम में लाना चाहिए इस प्रश्न का उत्तर ठीक - ठीक नहीं दिया जा सकता । शक्तिमान कवि चाहे जिस छन्द में कविता करके सफलता प्राप्त कर सकता है । श्रीयुत जयशंकर ' प्रसाद ' जी ने वीर या आल्हा छन्द में ' प्रेम पथिक ' लिखकर यह साबित कर दिया है कि ऐसी कविता इस छन्द में अच्छी तरह की जा सकती है । आल्हा छन्द तुकान्त - हीनता के लिए चिरकाल से प्रसिद्ध है ही । हमारे विचार में ऐसी रचना के लिए 21 मात्राओं का प्लवंगम छन्द बहुत उपयुक्त है । आजकल प्रायः तुकान्त - हीन रचना इसी छन्द में की जाती है ।
हिन्दी - साहित्य का यह ' परिवर्तन - युग ' उपस्थित है । इस अवस्था में यदि हिन्दी - कविता के नये - नये रूपों की चर्चा चले तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं । ऐसी चर्चाओं में ' अन्वय - क्रम - निबन्धन ' की चर्चा भी एक है । छन्दों के लघु , गुरु वर्णों अथवा मात्राओं के विचार से कवि को उनमें वाक्यों के शब्दों को गद्य की तरह यथाक्रम रखने में कठिनता होती है । अतएव कविता का अर्थ जानने के लिए उसके अन्वय करने की आवश्यकता होती है । पर जिस कविता में अन्वय - क्रम - निबन्धता की रीति का पालन किया जाता है , अन्वय करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । हम इस प्रकार की कविता - रीति के विरोधी न होने पर भी उसकी अत्यन्त आवश्यकता नहीं समझते । इस रीति के अवलम्बन से कवि को विशेष कठिनाई का सामना करना पड़ेगा , जिससे रचना में विशेष विलम्ब का होना सम्भव है । पर , हाँ , जहाँ तक बन पड़े वाक्यान्तर्गत शब्दों को यथा - क्रम रखने का ही यत्न करना चाहिए जिससे दूरान्वय - दोष का भय न रहे । दूरान्वय - दोष भाव - स्पष्टता का बाधक है ।
छन्द - निर्वाचन में इस समय कुछ स्वतन्त्रता से काम लिया जाने लगा है - यह हमारे विचार में उचित जान पड़ता है । दोहा , चौपाई , कवित्त , सवैया लिखकर आज - कल सफलता प्राप्त करना जरा कठिन काम है । हम चाहे उपयुक्त प्रकार के छन्द लिखने में अपनी सारी योग्यता और शक्ति क्यों न खर्च कर दें , किन्तु उन्हें वैसे सुन्दर और प्रभावोत्पादक नहीं बना सकते जैसे कि वे हमारे पूर्ववर्ती कवि सरदारों के हाथ से बन सके हैं । गुसाईं जी ने चौपाई को , बिहारी ने दोहे को और देव - भूषण , पद्माकर आदि ने कवित्त - सवैया आदि को अपनाकर हिन्दी के काव्य - भण्डार को उनसे ऐसा भर दिया है कि उनका अभाव शायद कभी खटकेगा ही नहीं । जिन लोगों ने उक्त कवियों की रचना का रसास्वादन कर लिया है भला उन लोगों को आज - कल के टुटपुंजिये कवियों की लेखनी से निकले हुए दोहा - चौपाई और कवित्त - सवैये कभी अच्छे मालूम हो सकते हैं ? रसगुल्ले और बालूशाही खा लेने के बाद क्या सूखी रोटी का स्वाद किसी को पसन्द हो सकता है ? कभी नहीं । इसीलिए आजकल अन्यान्य मात्रा अथवा गण - वृत्तों का प्रचार वांछनीय है ।
योग्य कवियों को चाहिए कि ये पिंगल - कथित छन्दों के सिवा नये - नये छन्द निर्माण करें , ताकि अन्य लोग उनका अनुकरण कर सकें । इस प्रकार छन्द - निर्माण करने में पिंगल ही के नियमों का पालन किया जाय पर कई प्रकार के छन्दों के सम्मिश्रण से चार - छह या आठ चरणों वाले ऐसे छन्द प्रस्तुत किये जायें जिसके रूपों में बिल्कुल ही नवीनता पाई जाय और जो पढ़ने में भी मधुर जान पड़े । इस प्रकार के नये - नये छन्दों के विरोधियों को स्मरण रखना चाहिए कि उनके निर्माण का उद्देश्य पिंगल कथित छन्दों के प्रचार को रोकना या उन्हें नीचा दिखाना नहीं , बल्कि हिन्दी कविता के उपयुक्त छन्दों की संख्या बढ़ाना और भाषा - पिंगल को नयी - नयी कविता - रीतियों और नये - नये छन्दों से सम्पन्न करना ही है ।
खड़ी - बोली की कविता के लिए उर्दू के कुछ छन्द बहुत उपयुक्त हैं । अतएव - ऐसे छन्दों में यदि कविता की जाय तो कोई हानि नहीं । पर इसमें एक कठिनता यह है कि उर्दू के छन्दों में मात्रा अथवा वर्गों की संख्या गिनी नहीं जाती , उच्चारण के अनुसार ह्रस्व को दीर्घ और दीर्घ को ह्रस्व मानना पड़ता है , पर हिन्दी के छन्दों में यह बात नहीं है । इस अवस्था में उर्दू के छन्दों में हिन्दी कविता लिखते हुए हिन्दी के छन्दों का नियम पालन न करना , हमारे विचार में जरा न्यायसंगत नहीं जान पड़ता । अतएव ऐसे छन्दों में कविता लिखने के समय केवल उच्चारण के ही ख्याल से मात्राओं की एकदम अवहेलना नहीं करनी चाहिए । जहाँ तक बन पड़े , उच्चारण के अनुकूल शब्द ही प्रयोग करना चाहिए । हाँ , विवशता के समय यदि उच्चारण ही पर अवलम्बित रहें तो यह दूसरी बात है । पर , ऐसे अवसरों पर मात्राओं के ख्याल से शब्दों को तोड़ - मरोड़ कर या विकलांग बना कर रखना उचित नहीं है जैसा कि आज - कल कुछ लोग करते हैं । उन्हें उनके प्रकृत रूप में ही रहने देना चाहिए । उच्चारण के अनुसार उनसे आवश्यक मात्राओं का काम निकाला ही जाता है । उर्दू में भी इसी रीति का पालन किया जाता है ।
थोड़े दिन से कुछ लोग हिन्दी में चतुर्दशपदी पद्य के प्रचार करने के प्रयत्न में हैं । अंग्रेजी और बंगला - साहित्य में उसका यथेष्ट प्रचार देख कर यदि हिन्दी प्रेमियों का ध्यान भी उसकी ओर आकृष्ट हो , तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं । पर कुछ वर्ष पहले जब इस विषय का एक लेख ' प्रभा ' में प्रकाशित हुआ था तब हमारे एक मित्र महोदय ने उस पर हमारे सामने कई तरह की नुकता - चीनी की थी और चतुर्दशपदी पद्य को हिन्दी में अनावश्यक बतलाने का यत्न किया था । हर्ष की बात है कि चतुर्दशपदी पद्य की आवश्यकता कुछ संकीर्ण - हृदय वालों को ही नहीं जान पड़ती है , अन्यथा हिन्दी के वर्तमान - कालीन अधिकांश कृत विद्य और मर्मज्ञ कवियों को उसका प्रचार वांछनीय है । अब प्रश्न यह है कि ऐसे पद्य के लिए कोई खास छन्द नियुक्त किया जाय या छन्दों का निर्वाचन कवि की इच्छा पर अवलम्बित रहे ? उसमें तुकों का निर्वाह अंग्रेजी और बंगला चतुर्दशपदी पद्य के नियम के अनुसार किया जाय या साधारण कविता की तरह ? हमारी व्यक्तिगत समझ इस विषय में यह है कि छन्द निर्वाचन का कार्य कवि की रुचि पर ही निर्भर रहे , पर तुकों का निर्वाह अंग्रेजी और बंगला के सोनेट्स के नियम से ही हो । यदि इस तुक की झंझट से दूर रहने की इच्छा से चौदह पंक्ति की तुकान्त युक्त अथवा तुकान्त - हीन रचना चतुर्दशपदी पद्य के नाम से प्रचलित की जायेगी तो उसमें क्या विशेषता रहेगी ? वैसे तो द्वादशपदी और षोडशपदी आदि अनेक तरह के पद्य लिखे जा सकते हैं और लिखे भी जाते हैं ।
कुछ लोगों का कहना है कि जिस प्रकार भाव के अनुसार भाषा का प्रयोग किया जाता है , उसी प्रकार विषय के अनुसार छन्द का प्रयोग करना चाहिए । प्राचीन - काल में संस्कृत के कवि इस बात का विचार रखते थे और उन लोगों ने रसानुकूल छन्द भी नियुक्त कर लिए थे । पर इतना होने पर भी अनेक कवि अपनी रुचि के अनुकूल छन्दों का ही प्रयोग करते थे । यद्यपि किसी विषय का वर्णन छन्द विशेष में बहुत अच्छा लगता है , तथापि योग्य कवि चाहे किसी छन्द में उसका निर्वाह उत्तमता - पूर्वक कर सकता । यह बात अभ्यास पर भी अवलम्बित रहती है । किन्हीं - किन्हीं को कोई खास छन्द सध जाता है । ऐसे लोग प्रायः प्रत्येक रस के वर्णन में उसी सधे छन्द ही को काम में लाते हैं । विषयानुकूल छन्द नियुक्त रहने पर भी वे उनका प्रयोग नहीं करते । हमारे विचार से हिन्दी में भी विषयानुकूल छन्दों की सूची बन जानी चाहिए । उसके अनुसार कविता की जाय या न की जाय , यह दूसरी बात है ।
छन्दों के विषय में हम और भी कुछ बातें लिखते , पर संक्षिप्तता से काम लेने पर भी लेख का कलेवर कुछ बच गया है , अतएव अब हम अपने मान्य पाठकों से विदा होते हैं ।
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(छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध
पं.मुकुटधर पांडेय, संपादक, डाँ. बलदेव
प्रकाशक, श्रीशारदा साहित्य सदन,रायगढ़)
प्रस्तुति:-प्रकाशक:-बसन्त राघव साव
ईमेल:-basantsao52@gmail.com
मो.नं. 8319939396
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