दरद

 

(बसन्त राघव की छत्तीसगढ़ी कविता)
दरद
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खुद ल देख के दरपन मा
भूसा कीरा कस संकलाथंव
सुक्खा ठुठुवा बमरी कस मोर
दसा ल देख के भकलाथव।

ए कैसन काया -कलप होगे
पैंरा पटवा कस करिया झुलुप होगे
देहें - पाना होगे पिंवरा खड़खड़
मोर सुग्घर चेहरा कुरुप होंगे

मोर लरिकाई अऊ जुवानी के
सुघराई  कहां लुका गय
दुखदायी चौथा पन देख के
पथरा कस छाती धुकधुका गय

आंखी मा कतका रहिस अंजोर
धुवां धुवां कस आज अंजा गय
फटिंग निलहा अगास मा जइसे
करिया टरटर बादर गंजा गय

मुहूं  मा  जुन्नटहा छाला हे
सुवाद मा लगे ताला हे
का होही दू जिनगी के
आंखी मा छाए जाला हे।

पहली धधकत रहिस जे आगी
कच्चा लकरी आज गुंगुवा गय
मोर जांगर जग मा उजागर
माटी कस आज गरुवा गय।

डहर छंहा के सबोच पराथें
काहीं नई सुहाए मोर बुढ़ौती
फेर मोर हाथ धरेच रइथे
ई कूबरी लौठी पुरखौती

सरवन कुमार कस ई लौठी ह
तिरिथ बरत  कराथे मोला
रद्दा के कांटा कंकर तिरियाथे
जैइसे मोर बबा शंकर भोला

सुवारथ के सब संगी साथी
बिपत परे उछिन हो जाथें
सुख के परेवा चिराई कस
लहुट के डेरा कब आथें

अंग अंग खइत्ता हो गइस
जीव ल नइए सुख एकोछिन
परान पखेरू उढ़िया जाहीं
बाचेंच हावे गिनती के दिन

बसंत राघव
पंचवटी नगर,बोईरदादर, कृषि फार्म रोड
बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़
मो.नं.8319939396

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